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सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई / srashti ki uttpatti kese hui

सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई ?


दोहा - चेतन के इच्छा नहीं , जड़ से कछू न होय ।

          कहो जगत कैसे रचा , अचरज आवे मोय ।। 


                               शब्द 

       

टेक - धन्य गुरु कैसे खलक रचाया ।

ये तो संशय मुझको भारी पूछन को चित चाया ॥ धन्य  .....


1-एकोहं वो प्रथम एक था बहु साम किमि गाया ।

बहुत हुवा सो कारण क्या है यही भरम घट छाया ॥ धन्य  .....


2-काहे से पुरुष काहे से प्रकृति काहे से मूल रु माया ।

काहे से अहं महतत्व त्रिगुण खोल कहो कर दाया ॥ धन्य  .....


3-काहे से आकाश काहे से पवना काहे से तेज तत थाया ।

काहे से नीर काहे से पृथ्वी काहे में खलक समाया ॥ धन्य  .....


4-काहे से शब्द काहे से स्पर्श और काहे से रूप सवाया ।

काहे से रस और गंध काहे से इनका भेद न पाया ॥ धन्य  .....


5-कहां अपान प्राण है किस घर कहा समान ठहराया। 

कहाँ उदान व्यान है किस घर यह अचरज मोहे आया ॥ धन्य  .....


6-किस गुण से इन्द्रिय दश कहिये किस गुण देव कहाया ।

 किस गुण से पञ्च भूत आत्मा यह भ्रम मोहि सताया ॥ धन्य  .....


7-कौन है जीव कोन है ईश्वर कौन ब्रह्म दरशाया ।

सेवा भारतीकी अरज सुणो गुरु संशय हरण तुम पाया ॥ धन्य  .....


शिष्य की शंका सृष्टि उत्पत्ति विषय में है सो अगले भजन में कहेंगे कि कैसे सृष्टि की उत्पत्ति हुई है -


सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई थी ?


दोहा-चेतन कछु ना कर सके बिन माया सम्बन्ध ।

         माया के सम्बन्ध से रची सृष्टि गोविन्द ।। 


                         शब्द 

टेक - सुन शिष्य ऐसे ही खलक रचाया ।

अविगत पुरुष अटल अविनाशी सो तो रहे निरदाया ॥ सुन....


1-जैसे बीज से अंकुर तरु शाखा पत्र फूल फल छाया ।

त्योंही अलखसे खलक भयो सब अगम निगम यश गाया ॥ सुन....


2-स्वत : पुरुष पुरुष से प्रकृति प्रकृति से मूल माया । 

माया से अंह अंह से महतत्व त्रिगुण हि भेद बताया ॥ सुन....


3- महतत्व से आकाश , आकाश से वायु वायु से तेज तत थाया

  तेज से नीर , नीर से पृथ्वी , पृथ्वी से खलक समाया ॥ सुन....


4-आकाश से शब्द वायु से स्पर्श तेज से रूप सधाया। 

नीर से रस और गंध पृथ्वी से , पञ्च विषय ठहराया ॥ सुन....


5- गुदा अपान पारण हे हृदय , नाभि समान समाया ।

कण्ठ उदान व्याग रग २ में पांचों ही प्राण बताया ॥ सुन....


6-रजो गुण से इन्द्रिय दश कहिये सतो गुण देव कहाया ।

 तमो गुरग से पञ्चभूत यात्मा यह सब त्रिगुण माया  ॥ सुन....


7-त्वं पद जीव और तत्पद ईश्वर असि पद ब्रह्म बताया ।

 कल्याण भारती हम तिहु साक्षी अहं ब्रह्मास्मि थाया ॥ सुन....


सृष्टि की उत्पत्ति कब हुई ?


   [ गुरु उवाच ] हे शिष्य , अर्थ इसका यह है कि उपनिषदो में सृष्टि की उत्पति जिस प्रकार कथन की है । उसी प्रकार इसी में वह वर्णन करता हूँ , सो सावधान होकर सुनो- इससे तेरा सर्वभृम निवृत्त हो जायेगा । 

जैसे सूक्ष्म वटके बीज से महान पर्वत समान वृक्ष उत्पन्न होता है , हे शिष्य ! उसी प्रकार आत्मा से जगत उत्पन्न होता है और परमात्मा सबसे अभेद है अर्थात् किसी वस्तु में भी भेद नहीं जैसे आकाश सर्व में व्यापक है । इसी प्रकार आत्मा चींटी से ब्रह्म पर्यन्त सर्व के हिरदै में परिपूर्ण है । द्वैत रहित है । अर्थात् उसके सिवा सप्टि के पूर्व कोई भी पदार्थ नहीं था । कारण कि वो आपही प्रकाशमान है । वह भगवान ज्योतिरूप है , उसी को पुरुष कहते हैं , वह शून्यका का भी दृष्टा है । जैसे पदार्थो के अभाव का नाम शून्य है और वह अभाव के भाव को भी जानता है ताते शून्य नहीं किन्तु शून्यके दृष्टान्तसे उसको सिद्धी होती है । 

उदाहरण के लिए जैसे ॐ खम् ब्रह्म । अर्थात् परमात्मा , खम् अर्थात् आकाश , ब्रह्म याने महान , यानी परमात्मा आकाशके वत सर्व व्यापी और महान है इसलिये पुरुषकी सिद्धी शून्य बतलाई है । 

आगे पुरुष पुरुषसे , प्रकृति प्रकृति से , मूल माया मूल माया से , अहं सुप्रति अहं सुप्रतिसे , महतत्व महतत्वसे तीनों गुण अर्थात् सत् रज तम इन को तीनों देव भी कहते हैं । जैसे सतोगुणी विष्णु होकरके जगत का पालन करता है , रजोगुणी ब्रह्मा होकर जगत को उत्पन्न करता है और तमोगुणी शिव होकर जगतका संहार करता है । ये तीनों परमात्माकी शक्तिहोके नामहैं

 इसीप्रकार परमात्मा तीनों गुणोंको रचके गुणोंका भोक्ता होता भया , कारण कि परमात्माके स्वरूपभूत अलौकिक ज्ञानका नाम योग माया है । यानी उससे भिन्न नहीं । 

जैसे गीता अध्याय ५ श्लोक २६ भगवान ने अर्जुन से कहा है । 

श्लोक - भोक्ताकारम् यज्ञ तपसां सर्व लोक महेश्वरम् । 

           सुहृदं सर्व भूतानां ज्ञात्वा मां शान्ति मृच्छति ।। 

अर्थ -- मैंयज्ञ , तपस्याका भोक्ताहूँ और सर्वलोकोंका महेश्वर एवं सर्वभूतोंका स्वमित्र अर्थात् उपकारी हूँ । हे अर्जुन , जो इसप्रकार मुझको जानताहै वह शांति जो मोक्षहै , उसको प्राप्त हो जाता है । और महतत्वादि तो कार्यरूप होकर आप ही उत्पन्न होते हैं , जैसे कि मनुस्मृति अध्याय १ श्लोक ७ में श्री में 

मनु ने कहा है  : - 

यो सावती इन्द्रियः ग्राहः सूक्ष्मो अव्यक्तः सनातनः । 

  सर्वभूतमदोः अचिन्त्यरात्मा सवयवस्समुद्भवः ।। 


अर्थ - लोक वेद पुराण इतिहासादि से प्रसिद्ध परमात्मा 

इन्द्रियों के ज्ञान से बाहिर है। सूक्ष्म अव्यक्त और सनातन सर्वभूतों का आत्मा है , अचिन्त्य है , प्रमाण करने के योग नहीं कि वो ऐसा और इतना है । वह प्रापही प्रकाशित हो महतत्व आदि कार्य रूप से हुआ है ।


सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई दिखाए -


 जैसे श्रुति में कहा है 


श्लोक -- यत्तस्मात्दात्मनः आकाश संभूतः आकाशात्वायुः। 

  वायुरग्निरग्निरापोः अद्भ्यः पृथ्वी पृथ्वीव्याम् चतुर्दशलोकः  


अर्थ -- यह है कि महतत्वरूप आत्मा से आकाश , आकाश से वायु , वायुसे अग्नि , अग्निसे जल , जलसे पृथ्वी और पृथ्वीसे १४ लोक निर्माण भये , अर्थात् अतल १ वितल २ सुतल ३ तलातल , रसातल ५ भूतल पाताल ७ ये नीचे के सात लोक हैं । 

आकाश लोक १ , स्वर्ग लोक २ , इन्द्रलोक ३ गौ लोक ४ , जीव लोक , तपो लोक ६ , सत्य लोक ७ ये सात लोक ऊपर के लोक हैं । 

इनमें सब लोकोंकी रचना आचुकी है 

और पांचों तत्वके सतोगुण अंश से पांच ज्ञानेन्द्रिय और चार अन्तःकरण होते भये और रजोगुण अंशसे पांच कर्म इन्द्रियां होती भयी । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध ये ज्ञान इन्द्रियों के विषय हैं । 

चलन, बलन, धावन, पसरन , संकोच ये कर्मेन्द्रियोंके विषय हैं । इन पांचोंका परस्पर मिलाप होने से २५ होते हैं। 

जैसे पृथ्वी की प्रकृतियां - हाड़ पृथ्वी से, मांस जलसे , नस तेजसे , त्वचा वायुसे , रोम आकाशसे । 

जल की प्रकृतियां- वीर्य जलसे , मूत्र तेजसे , पसीना वायुसे , रक्त पृथ्वीसे , लार प्राकाशसे ।

तेज तत्वकी प्रकृतियां- क्षुधा तेजसे, तृषा वायुसे , कान्ति जल से आलस्य पृथ्वी से निद्रा आकाश से । 

वायु की प्रकृतियां- दौड़ना वायुसे , पसरना आकाशसे , कूदना तेजसे, चलना जलसे, सुकड़ना पृथ्वीसे 

आकाश तत्वकी प्रकृतियां- दुःख आकाश से, सुख वायु से , लाज तेज से , लोभ जल से , भय पृथ्वी से , 

ये २५ प्रकृतियां हैं और इसीप्रकार दूसरी रीतिसे १२५ भी होती है परन्तु यह रीति सूक्ष्म है सो जानें । 

गुदा में अपान , हिरदा में प्राण , नाभि में समान , कंठ में उदान और ब्यान वायु सारे शरीर में रहती है । 

रजोगुण से दश इन्द्रियां, सतोगुण से मन आदि चौदह देवता और तमोगुणसे पांच तत्व ये सब त्रिगुणात्मक माया मेरे ही अधिष्ठान से उत्पन्न होती भई और वह ही सर्वको उत्पन्न करके उसमें आपही प्रवेश करता भया 


सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई बताये - 


जैसे श्रुतिमें कहाहै , 

ततः दृष्ठा तद देवान प्राविस्यते 

अर्थात् परमेश्वर आपही जगतको उत्पन्न करके आपही जगतमें प्रवेश करता भया सो वही जीवहै । विष्णु सहस्त्र नाम में व्यासजी ने जीव नाम भी विष्णुका बतलाया है जैसे सृष्टिकी उत्पति होती है वैसे ही समाप्ति भी समझना चाहिये । सो ऐसे कि पृथ्वी चवदह लोक सहित जल में लीन हो जाती है तथा जल अग्नि में , अग्नि वायु में , वायु आकाश में और आकाश महतत्व रूप आत्मा में लय हो जाता है। 

अहंकार मूल माया प्रकृति सर्व पदार्थ उस विश्वास में ही लीन हो जाते हैं । एक पूर्ण ही शेष रह जाता है और चैतन्योभिन्नत्वात अचेतन्योत्वात् अर्थात्चैतन्य से भिन्न जो पदार्थ है वह सब अचेतन्य है सो मिथ्या वा नाशवान है। कारणकि ज्ञानसे संसार अज्ञान प्रतीत होताहै

जैसे :- दोहा -

 प्रज्ञान जगत की आदि है , ज्ञान जगत का अन्त । 

  आदि अन्त को जो लखे , सो ही पूरण सन्त ।।

जैसे सीपी में रूपा , रज्जु से सर्प भ्रम से प्रतीत होवे है, वास्तवमें है कुछ भी नहीं , जैसे पित्त के रोगी को पृथ्वी पीली दिखती है तथा रोग निवृति होनेसे फिर शुद्ध दिखने लगती है । इसी प्रकार अज्ञान से जगत भाषै है और अज्ञान निवृत्ति हुये पीछे जगत खोजने मात्रसे भी नहीं मिलता है , केवल आत्मा ही शेष विद्यमान रहता है , सो वही सर्वका प्रेरक और अन्तर्यामी है । वह द्वैत रहित अर्थात् एक है । उसका वर्णन नहीं हो सकता , वही हम , तुम तथा प्राणी मात्रका स्वरूप है । अज्ञान ही बन्धन है और जान लेना ही मोक्ष है । वह आत्मा पृथ्वी नहीं , क्योंकि वह गन्ध रहित है . वह आत्मा जल नहीं क्योंकि वह रसातीत है ,  वह आत्मा अग्नि नहीं क्योंकि वह रूप रहित है , वह आत्मा वायु नहीं क्योंकि उसमें स्पर्श नहीं है और वह आत्मा आकाश नहीं है क्योंकि उसमें शब्द गुण नहीं है । इस प्रकार आत्मा न पृथ्वी है , न जल है , न अग्नि है , न वायु है , न आकाश है और न तीनों गुण है । इसलिए वह गुणतीत है और वही एक निर्गुण ब्रह्म है। 

श्रुति में कहा है :-

श्लोक- सर्व खलविदं ब्रह्म , नैनानास्ति किञ्चनः। 

अर्थ -- सर्वत्र ब्रह्म स्वरूप ही है तो फिर नाना क्या ? यह नाना प्रतीत होवे सोही भ्रम है । जैसे , चीनी एक है और खिलौने अनेक है, इसी प्रकार आत्मा में जगत नाना भांति है परन्तु आत्मा एक है जैसे खिलौनोंके नाम -- रूप के त्याग हुये बिना बालकों को सम्यक् चीनीका बोध होवे नहीं , इसी प्रकार स्वरूप का साक्षात हुये बिना जगत की निवृति भी बने नहीं ऐसा नियम है । इसीसे योगी संसाररूपी मिथ्या घरको त्यागकर तथा सर्व संकल्प रहित होके आत्माको आत्मामें आत्मासे देखता है । 

सारांश यह है कि -- जैसे फैन - बुदबुदा या तरंगें जल में उत्पन्न कर जल में ही लीन हो जाती हैं , इसी प्रकार जगत भी आत्मा से उत्पन्न हो आत्मामें ही लीन हो जाता हैं जैसे , सुखदेव अध्यात्म प्रकाश में कहा है : 


सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई थी ?


दोहा - आप ही चेतन ब्रह्म अखंडित ताको उपजो इच्छा । 

ताही से फिर माया कहिये नीके सुनियो शिक्षा ॥१ ॥ 

माया - जड़ चेतन ब्रह्म को , तामें भयो आभास ।

सत रज तम तीनों उपजाये , तातै द्वेत बिलास ॥२ ॥

 भूल गयो अज्ञान में , अपना आत्म स्वरूप । 

ताही को फिर जानबो , ज्ञान कहे कवि भूप ॥३ ॥ 

ज्ञान ऊदय के होतही , संचय कर्म विलाय । 

क्रीयमान होवे नहीं , प्रारब्ध रह जाय ।।४ ।। 

सतो गुण अधिक बिम्ब और माया सोई ईश कहावे । 

तमोगुण अधिक बिम्ब और माया प्रकट जीवपद पावे ।


                    ।। सवैया ॥ 

शुद्ध सतो गुण के गुण तें प्रतिबिम्ब हो आप न भूल न पायो । 

माया को खैच करी अपने बस ईश वही सर्वज्ञ कहायो ॥ 

चौदह लोक रचे छिन में पुनि मेटत है जब चाहे मिटायो । 

सत अनन्त कहे सुकदेव सोहो पुरुषोत्तम वेदनमाहा गायो । 


                    ।। सवैया ॥ 

आपही तो चतुरान हो कर स्थावर जंगम जीव ऊपावे । 

आपहि रक्षा करै हरि होय के जीव को जहांके तहां पहुँचावे । 

रुद्र हो अन्त संहार करे पुनि कालिन काल हो सृष्टि नशावे 

यू जग खेल विसम्भरके जिमि बालक खेल खिलौना मिटावे ॥ 


इसी विषय में भगवान ने गीता के अध्याय १५ श्लोक १ में अर्जुन से इसप्रकार कहा है :-

 श्लोक -- ऊर्ब मूल भवःशाखामश्चत्थम् प्राहुरव्ययम् 

         छन्दांसि यस्य प्रर्णानियस्तम् वेद स वेदवित् ।। 


अर्थ - उर्ध यानी उपर सत्य लोक में जो ब्रह्म है वही इस सृष्टि का मूल है ,

अधः अर्थात् सत्य लोक से नीचे मनुष्य , देव , कीट पतंगादि देह धारी जीवाजून , यही शाखा हैं और नाश रहितको अश्वत्थम् कहा है । 

वेदकी रिचायें उसकी पत्तियां हैं जैसे पत्ते करके वृक्ष बढ़ता है वैसे ही वेद युत यजादि कर्म करनेसे संसार रूपी वृक्ष फलता और फूलताहै । जो इसे जानता है वो वेद का ही जानने वाला है । वेद इस संसारको छेदने का उपाय कहता है । 

जैसे श्रुति विर्ष कहा है । अध्यारोप अपवादाभ्याम् निष्प्रपंचोः प्रपंचतेः । 

अर्थात् वेद सृष्टिका अध्यारोप करके अपवाद किया है इससे परमात्मा प्रपंच रहित , निरप्रपंचरूप है , तातै प्रपंचका वाद किये बिना अपने स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं होता क्योंकि जगत ज्ञानका बाधक है और ज्ञान मोक्षका साधक । जहां दृष्टि है वहां सृष्टिहै जहां दृष्टिनहीं वहां सृष्टिभी नहीं ।  है  यदा दृष्टिः तदा स्टष्टिः , यदा दृष्टिः नास्ति तदाः सृष्टिः नास्ति । इसी को दृष्टिसृष्टि वाद कहते हैं । ब्रह्म - आत्मानिर - विवाद व स्वतः सिद्ध है सो जानें । 


इस विषय में श्री गोरक्षनाथ जी ने भी कहा है कि -


बिना नामका वृक्ष है बिना धरनि अंकूर । 

बिन पानीका पूतला सब जीवनका मूल । 


रहता कहाँ ? 


धरण से ऊँचा , गगन से नेड़ा , बहुत बारीक से बारीक । 

हाड़ मांस ताके नहीं स्वांस नहीं शरीर । 

जो पिंड में होता मरता नहीं कोय , 

जो होता ब्रह्मांड में लख लेता सब कोय । 

इण्ड पिंड ब्रह्मांड से खेल जा का न्यारा ! 

कहे श्रीगोरक्षनाथ सुनो कबीर वही प्रलक्ष हमारा। 


सत् गुरु श्री कल्याण भारतीजी कहते हैं कि हे शिष्य , त्वंपद जीव तत्पद ईश्वर और असि पद ब्रह्म , यह ताना मुझ साक्षी आत्मासे ही प्रकाशमान है ॥ इति शुभम् ।।


सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई ?


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