संथाल परगना पहले बिहार में था। अब झारखण्ड में शामिल हो गया है। यहीं पर एक छोटे से गाँव के एक किसान परिवार में मेरा जन्म हुआ था। संथाल परगना अब कई जिलों में बट गया है लेकिन मुझे अभी भी संथाल परगना नाम से बहुत प्यार है। संथाल परगना नाम किसी न किसी रूप में रहना चाहिए मेरा ऐसा मानना है। इसलिए में अभी भी अपने बारे में कुछ भी लिखता हूँ तो संथाल परगना का मोह नहीं छोड़ पाता हूँ। बचपन से यह नाम दिल - दिमाग में कंठस्थ हो गया है।
मेने जब होश संभाला तो मेरी माँ ने मेरे जन्म से जुडी बहुत सारी रोचक घटनाओ का विवरण सुनाया और बताया था। माँ की सुनाई घटनाये मेरे दिल और दिमाग पर आज भी छाई हुई है और जब भी में अपने बारे में कुछ लिखता हूँ तो जन्म की सारी घटनाएँ सामने आ जाती है।
विवेकदास जी का जन्म -
मेरा जन्म भादो मास की चतुर्थी के दिन हुआ था। उस दिन 11 अगस्त बुधवार का दिन था। इस दिन के चाँद को हमारी तरफ चोरचंदा का चाँद कहते है। इसी दिन गणेश जी का भी जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन को गणेश चतुर्थी भी कहते है। हमारी तरफ लोगो में इस दिन के जन्म को गाँव - घरो में अच्छा नहीं मानते है ऐसी मान्यताये और अनेक कहावते भी प्रचलित है। इस दिन चोर रात में चोरी अवश्य करते है। यदि इस दिन चोर चोरी करने में सफल हो जाते है तो फिर चोरी करने में वे कभी भी नहीं पकडे जाते है , लोक में ऐसा प्रचलन है। जहाँ ऐसी कहावते प्रचलित हो तो इस दिन मेरे जन्म को लेकर घर - परिवार के लोगो को कितने ताने सुनने पड़े होंगे , यह समझा नहीं जा सकता है। लेकिन इसमें उनका क्या दोष,
मेरे जन्म को लेकर घर - परिवार के लोग बेहद परेशान थे और इसके काट और उपाय के लिए ओझा , गुणी से तंत्र - मंत्र कराने के लिए जगह - जगह भाग रहे थे। जिस घर में मेरा जन्म हुआ था ; कहते है की उस घर में एक सांप भी कही से घुस आया था। जन्म लेना तो प्रकृति का खेल है। इस खेल से कर्म और अकर्म जुड़ा हुआ होता है। मेरे जन्म के साथ एक शुभ संदेश भी जुड़ा हुआ था। चार बजे भोर में जन्म हुआ था और इसके पहले पुरे समय में एक बूँद वर्षा नहीं हुई थी। चार बजे भोर में इस दिन मूसलाधार वर्षा हुई थी। वर्षा के कारण ही कहीं से घर में एक सांप घुस आया था। मेरे जन्म के साथ सांप की घटना भी अद्भुत रूप से जुडी हुई है। वर्षा के कारण किसानो और गाँव - घरो में खुशहाली की लहर दौड़ गई थी। लोग कहने लगे मेरे जन्म के कारण ही गाँव और क्षेत्र में खुशहाली आई है।
विवेकदास जी का बचपन -
में जब छोटा सा था तो बचपन में बिस्तर के चारो तरफ सांप - सांप ही दिखता था। में भय से चिल्लाता था और सांप से घिरे होने की चर्चा करता था। बाप ओझा - गुणी देवी देवताओ और तंत्र मन्त्र करने वालो के पास ले जाता था। एक सांप विशेषज्ञ ने बताया था की पिछले जन्म में सांप के काटने से इसकी मृत्यु हुई है। इसलिए इसकी आत्मा में सांप की दहशत है। सन 1986 में मुझे भयानक एलर्जी हो गयी थी। कपाल और चेहरे पर बड़े - बड़े दाने निकल आये थे। देश में बड़े - बड़े चर्मरोगो के विशेषज्ञों को दिखाया पर ठीक नहीं हुआ। तब में सिर पर पगड़ी बांधने लगा था।
यह बात मठ में सबको मालूम है कि में सांप से डरता हूँ। सन 2010 में जब पूर्व महन्त गंगाशरणदास ने मेरे ऊपर कई सौ बदमाशों को लेकर हमला किया था। इस दौरान एक दिन जब में अपने कमरे में गया तो मेरे कालीन पर कई करैत सांप घूम रहे थे। मठ के संतो ने बताया की कोई डब्बे में रखकर मौका पाकर कमरे में छोड़ गया है। अब इतना भी डरने की जरुरत नहीं है। सांप को देखकर घर -
विवेकदास जी के बारे में भविष्यवाणी -
बहरहाल, छठी - बरही बीतने के बाद पिताजी ने बगल के गांव में रह रहे एक ज्योतिष को घर पर बुलवाया। ज्योतिष पंडितजी ने मेरे जन्म की कुंडली देखकर कुछ आश्चर्यजनक भविष्यवाणियां की थी। ज्योतिष पंडित जी ने मेरे जन्म के बारे में जो कुछ कहा था वह तो आज सच साबित हुआ है। ये सारी बाते कल्पना से भी परे थी। राजपरिवार में ही ऐसी बाते संभव हो सकती है।
पहली बात ज्योतिष महाराज ने कहा था कि इसकी राशि - तराजू के तुले के समान है - किधर झुकेगा कहा नहीं जा सकता है। जिधर झुकेगा उधर ही अपने वर्चस्व का प्रभाव बना लेगा। इसकी राशि की कुंडली में कई पक्ष जबर्दस्त और अनहोनी जैसे है। प्रकृति ने कुछ कार्य इसके लिए निर्धारित किया है। एक बात जरूर है यदि ये अपराध की दुनिया में प्रवेश कर गया तो उधर ही महारथ हासिल करेगा और यदि अध्यात्म की तरफ झुक गया तो उसमे भी सिखरता को छुएगा। दोनों राशियों का योग प्रबल है। ऊपर से कठोर दिखाई पड़ेगा लेकिन भीतर रहम दिल होगा। यदि पढ़ाई - लिखाई से रिश्ता बना तो बेजोड़ विद्वान बनेगा। तब क्षेत्र में तो कही भी पढ़ाई - लिखाई का माहौल नहीं था। उस समय हमारे गाँव में एक भी आदमी क , ख जानने वाला नहीं था।
पढ़ना - लिखना भी जीवन का एक पक्ष है।
मेरे गांव में एक काली मंदिर था। यह मंदिर मिट्टी की दिवार से बना था और ऊपर से खुआ हुआ था। वैसाख महीने में हमारे गांव के घटवार जाती के लोग इस मंदिर में पूजा करते थे। पूजा के दिन इस मंदिर में काली माँ के नाम पर दर्जनों बकरे और पशु - पक्षियाँ कटते थे। देवी मंदिर में बलि की प्रथा जबरदस्त थी।
में एक दिन देवी - मंदिर पर पूजा देखने गया तो यह देखकर दंग रह गया। लहुलुहान देवी मंदिर में खून की धारा देखकर मुझसे रहा नहीं गया। मेरे साथ कई लड़को की टीम थी और मेने यहीं पर पुजारी और जिस पर काली माँ सवार होती थी उसकी इतनी पिटाई की कि सबलोग देवी मंदिर छोड़कर भाग गए। रात में मेने लड़को की टीम लेकर देवी - मंदिर को मटियामेट करके नदी में बहा आया। लोग गालियाँ देते रहे और शापित करते रहे कि जल्दी ही लड़के को काली माँ खा जाएगी अब इसका समय पूरा हो गया है। एक सप्ताह के आस -
कबीरपंथी बनने के बाद तो मेरा विश्वास और भी द्रढ़ और मजबूत हो गया कि सचमुच ही यह धर्म के नाम पर पाखंड और कर्मकांड का हिस्सा है।
ज्योतिषी पंडित जी की बाते गूलर के फूल के समान लोगो को लग रही थी। गूलर में शायद फूल नहीं होते है। गदहे के सींग का भी उदाहरण देते थे। गदहे को भी सींग नहीं होता है। हमारे क्षेत्र में एक और भी पेड़ होता है उसका नाम है सोहड़ा। इस पेड़ मे भी फूल नहीं होता है लेकिन लदकर फल देता है। इस पेड़ की खास बात यह है कि इस पेड़ के आस - पास बिजली का ठनका नहीं गिरता है। हम लोग गांव में गाय - भैंस चराते थे और जब बादल की गड़गड़ाहट की आवाज होती थी तो हमलोग भागकर सोहड़े पेड़ के निचे छिपने जाते थे। कहीं दूर होते थे तो सोहड़ा की आवाज लगाते थे। जो चीजे संभव नहीं होती है तो गांव के लोग इन्ही सबका उदाहरण प्रस्तुत करते है।
विवेकदास आचार्य की पढ़ाई -
चौदह साल की उम्र बीत रही थी। गांव - घर में गाय भैंस की चरवाही करते हुए अभी कपड़े पहनने की तमीज भी नहीं आयी थी। धारिया - विस्टी पहनकर अर्धनग्न जीवन बिता रहे थे। प्रायः गांव का जीवन और बालपन ऐसा ही होता है। सब लोगो की बाल - लीलाये परिस्थिति और परिवेश के अनुसार ऐसी ही होती है।
सन 1960 के आस -
मेरी भी जिज्ञासा जगी। गाय , भैंसो को चारा डालकर में भी नौ बजे रात में बंगले पर लगी पाठशाला में हाजिर हो गया। मुझे भी एक स्लेट , चाक - पेन्सिल और खल्ली मिली। आश्चर्य की बात तो यह हुई कि बारह बजे रात होते - होते अकार और ककहरे के सम्पूर्ण अक्षरों को लिख - पढ़कर मास्टरजी को सुना दिया। अक्षर - बोध के बाद पढ़ने के लिए मनोहर पोथी दी जाती थी। वह भी आधी पुस्तक पढ़कर सुना दिया। मास्टरजी को लगा की एक अक्षर पर हाथ घुमाने में महीनो का समय लग जाता है। इस लड़के ने तो एक ही दिन में अक्षर - बोध की सिमा लाँघ दी। यह सब देखकर मास्टरजी चकित हो गए। मास्टरजी ने कहा - सुबह तुम्हारे बाप से मिलकर तुम्हारी आगे की पढ़ाई के लिए बात करेंगे। मेने बताया की मेरे बाप खूसट किस्म के आदमी है। वे किसी की कुछ सुनते नहीं है। मास्टरजी ने कहा - जैसा भी हो हमे मिलना है। सुबह होते ही मास्टरजी घर पर पहुँच गए। बाप से दुआ - सलामी के बाद मेरी पढ़ाई के बारे में चर्चा की तो वे नाराज होकर आग - बबूला होकर मास्टरजी को उल्टा - सीधा सुनाने लगे। मास्टरजी ने कहा - लड़के में अद्भुत क्षमता है। इसे स्कुल भेजिए तो पढ़ - लिखकर जरूर कुछ कमाल करेगा। बाप ने कहा - इतना बड़ा हो गया अब पढ़ - लिखकर क्या कलेक्टर बनेगा। गांव - घरो में अधिक पढ़ने - लिखने पर यह मुहावरा प्रचलित है। कहते है कि अब कलेक्टर बनेगा। मैंने मास्टरजी से पूछा यह कलेक्टर क्या होता है ? मास्टरजी ने बताया अंग्रेजी काल में शासनिक - प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जिले में कलेक्टर की नियुक्ति होती थी। आज भी जिले में कलेक्टर जिले का सबसे बड़ा प्रशासनिक अफसर होता है। आज भी यह परम्परा यथावत है। तब मैने अपने मन में कलेक्टर बनने का इरादा पक्का कर लिया था। लेकिन इसके लिए पड़ना जरूरी था। मास्टरजी ने कहा - तुम पढ़ना चाहते हो तो मेरे साथ चलो। मेरे गांव से एक किलोमीटर की दुरी पर भगैया बाजार है। मास्टरजी ने अपने पास से दो खाकी का पेंट और दो सफ़ेद शर्ट दिलवाया क्योंकि भगैया मिडिल स्कुल का यही यूनिफार्म था। भगैया बाजार के बगल में मिडिल स्कुल था। मास्टरजी ने आठ साल उम्र कम करके पहली क्लास में नामांकन करवा दिया। खाकी का हॉफ पेंट और सफेद शर्ट पहनकर जैसे ही गांव में आया तो बच्चे - बूढ़े और जवान सब लोग मिलकर चिढ़ाने लगे कि अंग्रेजवा रे। मेरा जन्म सन 1949 में हुआ है और स्कूली प्रमाणपत्र में सन 1957 लिखा गया है। पहली क्लास में पाँच वर्ष की उम्र जरूरी होती है।
हमारे गांव के पिछड़ेपन का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि तब गांव में बाहर गांव से कोई बारात आई थी और उस बारात में कोई पैजामा - कुर्ता पहनकर आते थे तो उसको दो नलिया कहकर इतना चिढ़ाते थे कि समय से पहले ही वे गांव से भाग जाते थे। पिताजी से बक - झक करके प्रतिदिन में स्कुल जाने लगा। सन 1965 में पाँचवी कक्षा पास कर गया। ऊपर के क्लास वालो के पढ़े किताबो को आधी कीमत पर खरीद - खरीद कर पाँचवी कक्षा तक तो काम चला लिया। लेकिन आगे मुश्किल थी। छठी कक्षा में ढाई रूपये फीस लगनी थी और नई - नई किताबे भी खरीदनी थी। मेरे बाप दोनों के लिए तैयार नहीं थे।
हमारे गांव से कोलकाता पास में है। घर और गांव में बताये बिना ही में कोलकाता चला गया। कोलकाता में एक रेडियो की दुकान में रेडियो बनाने का काम सिखने लगा। चार महीना बीतने के बाद घर पर एक पत्र लिखा। पत्र अभी सही तरिके से नहीं लिख पा रहा था। पाँचवी कक्षा तक पत्र लिखने का अभ्यास भी नहीं था। किसी तरह रेडियो को रेहड़ी की दुकान लिख दिया। चार महीने तक माँ - बाप रो - रोकर बेहाल हो चुके थे। पोस्टकार्ड पाते ही घर वालो के जान में जान आई। गांव के बगल में करमेल गांव है। करमेल संम्पन्न और बड़ा गांव है। इस गांव के अनेक लोग कोलकाता में काम या नौकरी करते थे। नाम नहीं याद है एक जायसवालजी कोलकाता में किसी मिल में काम करते थे और एक सप्ताह की छुट्टी पर गांव आये हुए थे। बाप पोस्टकार्ड लेकर जायसवालजी के पास गये। बाप ने कहा - मेरा बेटा रूठकर कोलकाता चला गया है। एक पोस्टकार्ड आया है। जायसवालजी ने कहा - पोस्टकार्ड पर साफ साफ पता तो नहीं है। फिर भी , हम पता कर लेंगे। भवानीपुर में मोहन गली बनर्जी लेन प्रसिद्ध है। हम यहां पर लड़के को ढूंढ निकालेंगे।
एक दिन जिस दुकान में मै काम कर रहा था। अचानक जायसवालजी आ धमके। मेरा नाम लेकर पूछा इनमे कौन है। अपना सुनते ही भावुक हो गया। जायसवालजी ने मुझे चालीस रूपये थमाते हुए कहा - तुम तुरंत घर जाओ , तुम्हारे माँ - बाप परेशान है और वे लोग अब तुम्हे स्कुल भेजेंगे। इतना सुनते ही में गदगद हो गया। जायसवालजी ने कहा - बोलो कब जाओगे हम तुम्हे हावड़ा स्टेशन पर ट्रैन पकड़वा देंगे। मेने कहा - अब में घूमते - फिरते चतुर हो गया हूँ। एक सप्ताह के भीतर ही में गांव चला जाऊंगा। जिस दुकान में में काम कर रहा था वह भी जायसवाल ही थे। आते समय चार महीने की मजदूरी चालीस रूपये उन्होंने भी दी। बड़ाबाजार जाकर रेडीमेड पाजामा - कुर्ता लिया और एक छोटी सी अटेची खरीदी। शादी - विवाह , उत्सव - त्योहारों में सेठ का माइक बजाता था। एक थियेटर हॉल में रविवार और शनिवार को एक नाटक भी होता था। उस हॉल में मैं माइक लगाता था। माइक तो लगा रहता था सिर्फ बटन दबाकर चालू करना होता था।
कुछ - कुछ चीजे मेरे पास में जमा हो गयी थी। कोलकाता से घर नहीं आता तो आज रेडियो का अच्छा मेकेनिक होता। भवानीपुर से ट्रैन पकड़कर हावड़ा स्टेशन पर आया। नाम याद नहीं है कोई ट्रैन पकड़कर मिरजा - चौकी आया और गांव पहुंचने के पहले भगैया बाजार पंहुचा। बाजार में उस दिन देशी हाट लगा था। हाट में गांव - घर के लोग भी आये थे। सब लोग देखकर आश्चर्य चकित हो रहे थे कि में चार महीने में कितना बदल गया हूँ। कई लोग प्यार से पकड़ - पकड़ कर चुम रहे थे।
विवेकदास जी का नक्सली संगठन से जुड़ना -
अभी आंठवी कक्षा में चार महीने भी क्लास नहीं किया होगा कि क्षेत्र में तूफान जैसी एक हवा चली। यह हवा नक्सल - आंदोलन की थी। नक्सल बाड़ी हमारे गांव से कुछ ही दुरी पर है। नये - नये लड़के इस आंदोलन में शामिल हो रहे थे। में भी नक्सल आंदोलन में शामिल होने के लिये आंदोलन के मुख्यालय में पंहुच गया। क्योंकि बचपन से ही गरीबो , पीड़ितों , निरहजनो के पक्ष में काम करने की मंशा रहती थी। हमारे क्षेत्र में सूदखोरी और रिश्वतखोरी चरम सिमा पर थी। तब काफी हद तक सूदखोरी क्षेत्र में रुक भी गयी। मेने तीन साल तक आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उधर घर और गांव वालो को ज्योतिष की बात याद आने लगी। माताजी परेशान रहने लगी थी। रात - रात भर भोजन लेकर दरवाजे पर बैठी रहती थी और पिताजी गालिया देते रहते थे कि इस निकम्मे के लिये भोजन लेकर रातभर बैठी रहती हो। मेरे पास तीन जिले का प्रभार था - संथालपरगना , भागलपुर , और पूर्णिया। कभी घर पर आता था और कभी - कभी कई दिनों तक नहीं आ पाता था। माताजी की परेशानी देखकर में भी कभी - कभी परेशान हो जाता था। मेरी सांप - छछूंदर की गति हो गयी थी। संगठन छोड़ता तो अपने ऊपर हमले की संभावना अधिक थी। क्योंकि कई जिलों की बागडोर मेरे हाथ में थी। इधर माताजी ओझा - गुणियों और साधु - संतो के पास जाती रहती थी कि कोई हमारे बेटे को सही रास्ते पर ला दे। माँ - बाप को लगता था कि यह काम अच्छा नहीं है। जबकि मुझे लगता था कि यह देश और समाज सेवा का काम है।
विवेकदास जी का संगठन से विरोध -
सन 1970 में दुमका के जिला मुख्यालय में राष्ट्रीय स्तर पर संगठन की बैठक आहुत थी। राष्ट्रीय स्तर पर कार्यकर्ता एकत्र हुये थे। बैठक में अनेक प्रस्तावों पर चर्चा होनी थी। में भी अपनी टीम के साथ दुमका पहुँचा था। हमारे क्षेत्र से ही एक आदमी का चयन किया गया था। में अच्छी तरह उसे जानता था। वह इस काम के लिए उपयुक्त नहीं था।
मेने इसका विरोध किया और कहा कि यह मात्र व्यक्तिगत रंजिश का मामला है। जब मेरे ऊपर दबाव बनाने की कोशिश की गई तो में बैठक से उठकर बाहर आया और दुमका से बस पकड़कर सीधे गांव पंहुच गया। जगदीश सिंह प्रदेश के कमांडर थे। उन्होंने भी इस तरह का विरोध किया था। संगठन के लोग मुझे तलाशते रहे। मुझे ज्ञात हो गया था कि बैठक में क्या क्या तमाशा होने वाला है।
ये पूरी घटना कई पुस्तकों में मैने पहले भी लिखा है। जगदीश सिंह की हत्या और मेरे संगठन को छोड़ देने से कई जिलों में संगठन का अध्याय यहीं पर एकदम समाप्त-सा हो गया। मेरा ऐसा स्वभाव है कि मेरा मन बदलता है तो फिर उधर वापस नहीं जाता है। शूरमां की तरह मन तेज गति से उधर ही चलता जाता है जिधर सही लगता है। मेरा मन जिद्दी स्वभाव का है। आज भी मन वैसा ही है जिस दिशा में मुड़ता है तो उधर ही जाता रहता है। मन पर सत्य और असत्य का विवेक जरुरी होता है। मेरे मन ने मान लिया है कि यह पक्ष सत्य का है तो फिर वह काम मेरे लिए सर्वोपरि हो जाता है। आज सिखर पर पहुंचाने का कारण मेरा जिद्दी मन ही है। मेरे मन ने हारना कभी नहीं सीखा। यही तो बचपन से पड़ा और सीखा है, "मन के हारे है , मन के जीते जीत " .
संत विवेकदास आचार्य
साहेब बंदगी

0 टिप्पणियाँ