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रहना नहिं देस विराना है / rahna nahi desh virana he

 संत विवेकदास आचार्य का कबीर पंथ में आना -

मेरी माता मेरे ऊपर धार्मिक प्रभाव डालने के लिए निरन्तर प्रयास कर रही थी । हालांकि माताजी जानती थी कि मैं जल्दी किसी के प्रभाव में आने वाला नहीं हूँ । धर्म - कर्म में मेरा कोई विश्वास नहीं है । एक दिन बाहर से गाँव लौटा तो मुझे बताया गया कि आप के घर पर सत्संग हो रहा है । माताजी ने यह कार्यक्रम रखा था । कबीरपंथी साधुओं ने माताजी से सौ प्रतिशत शर्त रखी थी कि हमलोग आप के बेटे को कबीरपंथी बनाकर ही छोड़ेंगे । यह सब कुछ बता देने के बावजूद कि मैं किसी धर्म - कर्म में विश्वास नहीं करता हूं ।

जैसे ही घर पर पहुँचा तो माताजी हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी कि बेटा ! साधु - सन्त लोग हैं । कुछ मत कहना पाप लगेगा । मैं पाप - पुण्य तो मानता नहीं था । सत्य पक्ष के सामने पाप - पुण्य कुछ होता भी नहीं है । फिर भी , गाँव के कुछ लड़कों के साथ मैं सत्संग में शामिल होने गया । मैं सत्संग में चुपचाप जाकर बैठ गया । सत्संग में एक महात्माजी कबीर साहब का एक पद गा रहे थे ' रहना नहिं देस विराना है । '

विवेकदास का कबीर साहब का नाम सुनना -

 यहाँ पर पहली बार मैंने कबीर साहब का नाम सुना । बाबाजी मीठे स्वर में उपरोक्त पद को गा रहे थे । गाँव में मानस - पाठ आदि तो कई बार सुना था लेकिन कबीर साहब का भजन रहना नहिं देस विराना है सुना तो दिल में वो पद चुभ सा गया लेकिन इस बात को तुरन्त स्वीकार कर लेना बड़ा ही कठिन काम था । सत्संग से उठकर जब मैं घर की तरफ जा रहा था तो पीछे से एक साधु जैसा आदमी भागते हुए मेरे पास आया और कहने लगा कि हजूर ! कबीरपंथी बन जाइये । मैं गुस्से में लाल तो हो गया । हमने पूछा- यह कबीरपंथी क्या होता है ? उस साधु को बहुत ही भला - बुरा कहा और सामने से हटा दिया । मुझे तुरन्त किसी गाँव में एक कार्यक्रम में जाना था और चला गया । देर रात को घर पर वापस लौटा तो देखा कि दरवाजे के बाहर सड़क पर पाँच साधु साफ - साफ बिस्तर पर बैठे हैं । फिर , माताजी हाथ जोड़कर मेरे सामने खड़ी हो गयी और कहने लगी कि साधु बैठे हुए लोगों को कुछ मत कहना जो कुछ कहते हैं जरा सुन - तो लो । 

मैंने कहा तुम कहती हो तो मैं सुन लेता हूँ । माताजी की आज्ञा से मेरा मन शान्त और आज्ञाकारी हो गया था ।

बाबाजी लोग खा - पीकर मस्ती में आराम से थे । मैं बाबाजी लोगों के पास गया और कहा - बताइये आप लोग क्या कहना चाहते हैं ? बाबाजी लोगों के मुखिया ने कहा - हमलोग आपको कबीरपंथी बनाना चाहते हैं । हमने उनलोगों से बनकर क्या करना पड़ता है । उन लोगों ने कहा - हमलोग भी गरीब - दीन दुखियों का काम करते हैं । सत्संग से लोगों को धार्मिक भाव से ज्ञान का रास्ता बताते हैं और सत्य के रास्ते पर चलने के लिए उपदेश करते हैं । सत्य का नाम सुनते ही मेरे मन में थोड़ी सी आस्था जगी । कबीर साहब की वाणी में सिर्फ ज्ञान का ही रास्ता है । यदि आप कबीर साहब की वाणी पूछा- कबीरपंथी को समझ लेंगे तो खूब आनन्द आयेगा । बाबा लोग मुझे खूब समझाने की कोशिश कर रहे थे । मैंने कहा- यदि कोई ऐसी किताब है तो दीजिये हम पढ़कर देखेंगे और फिर आप लोगों से बात करेंगे । फिलहाल , कोई किताब देकर यहाँ से तुरन्त चलते बनिये । 

कबीर कसौटी-

डॉ ० लेहना सिंह की लिखी पुस्तक ' कबीर कसौटी ' पुस्तक मुझे दी गयी । मैंने इस पुस्तक को एक दर्जन बार पढ़ा । डॉ ० लेहना सिंह लाहौर के थे और लाहौर में ही यह पुस्तक लिखी गयी थी । मुझे यह पुस्तक कंठस्थ हो गयी थी । अच्छा लगा और पुस्तक पसन्द भी आयी । इस पुस्तक को पढ़ने से कबीर साहब के बारे में जानने की जिज्ञासा और भी तेज हुई । ‘ कबीर कसौटी ' पुस्तक से यह मालूम पड़ा कि जिन गरीबों , दलितों और उपेक्षितों के लिए हम लड़ाई लड़ रहे थे तो उसके मसीहा पुरुष तो कबीर साहब ही हैं । जिसने मुझे ' कबीर कसौटी ' पुस्तक दी थी ।

वह साधुवेशधारी गृहस्थ थे और कबीर साहब का सत्संग करते थे । वह साधु जैसे आदमी हमारे गाँव से करीब दस किलोमीटर की दूरी पर रहते थे । मेरी जिज्ञासा बढ़ी तो मैं उनके गाँव पर गया और उनसे निवेदन किया कि इससे और भी अच्छी और विस्तार से जानने के लिए कोई पुस्तक हो तो दीजिये । उनको लगा कि शेर - पिंजड़े में फँस गया है । इसको अब जैसा नाच - नचायेंगे । वैसा ही नाच - नाचेगा । मुझे यह समझने में देर नहीं लगी मेरा कड़ा रुख देखकर वे मुझे समझाने लगे कि धीरे - धीरे सब समझा दूंगा । मैंने उनसे कहा कि मेरी श्रद्धा और विश्वास को गलत मत समझिये । मैं कभी किसी की गुलामी और बंधन स्वीकार नहीं कर सकता । जानने - समझने की जिज्ञासा जगी है , यह एक अलग बात है । 

विवेकदास का काशी जाना -

गाँव - इलाके में शोर मच गया कि मैं अब साधु बनने काशीजी जा रहा हूँ । फक्कड़ बाबा रामदास गाँव में मुझे लेने आये थे । गाँव और आस पास के कई सौ लोग गाँव में जमा हो गये थे । सब - लोग विलाप कर रहे थे और रो - रोकर बेहाल हो रहे थे । रोते हुए सबलोग हमें छोड़ने के लिए नदी किनारे तक आये थे । बाबा लोग कह रहे थे कि साधु बनने जा रहे हो कि बारात लेकर कहीं जा रहे हो । दस - बीस लोग बाजार तक भी आये थे । बाजार में भी काफी लोग जमा हो गये थे बाजार में से घंटों समय लग गये थे निकलने में । बाजार में भी काफी जान - पहचान थी । गाँव छोड़ने का यह पहला दृश्य अभी तक नहीं भुलाया जा सका है जननी - जन्मभूमि की यादें भूलना तो थोड़ा कठिन होता ही है । बाद में कबीर , कबीरमठ और कबीरपंथ के कामों को लेकर इतना व्यस्त हो गया कि गाँव की सारी स्मृतियाँ भूल गईं और फिर गाँव जाने का अवसर ही नहीं मिला । शुरू में कुछ समय के लिए गया भी था तो राजनैतिक कारणों से फिर वापस आ गया , तो मन में याद भी नहीं है कि कहाँ है गाँव - घर । एक बार सोचता हूँ गाँव की धरती को चूमकर आऊँ । मैं बदल गया , मेरी उम्र बदल गयी और गाँव घर के लोग भी बदल गये होंगे । गाँव की परिस्थितियाँ भी बदल गयी होंगी चालीस साल में क्या कुछ नहीं हो गया होगा । अब सत्तर साल की उम्र हो गयी है । मैं सोचता हूँ कि एक बार गाँव की धरती को चूमकर आऊँ । क्योंकि यह तो कहा ही जाता कि जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादीप गरीयसी । 

कबीरचौरामठ मूलगादी-

मैंने पढ़ और जान रखा था कि कबीरचौरामठ मूलगादी कबीर साहब की कर्मभूमि और साधना - स्थली है । मुझे ऐसा लगा कि एक बार कबीर साहब की मूलगादी का दर्शन करना चाहिए । किसी एक आदमी के कारण और उनके व्यवहार से कबीर साहब और कबीरपंथ का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है । मूलगादी का दर्शन और यहाँ की स्थिति के बारे में जानने की जिज्ञासा तो जाग उठी थी । साधु बनना तो तय कर लिया था । लेकिन कन्दराओं और गुफाओं वाला साधु बाबा बनना तो मेरे लिए मुश्किल काम था । क्योंकि मेरे अन्दर सामाजिकता कूट - कूटकर भरी थी । विशेष रूप से कबीर साहब की सामाजिक पक्षधरता पर ही काम करने का मन बना चुका था । दूसरी तरफ मन पर बैरागी रंग भी चढ़ने लगा था । जिन लोगों के प्रभाव से कबीरपंथी बना था । वे लोग कबीर साहब के नाम पर कर्मकांड और पाखण्ड करते थे । फक्कड़बाबा रामदास से मैंने निवेदन किया कि बाबा मुझे काशीजी कबीरचौरामठ पहुँचा दीजिये । संयोग बना तो वहाँ रहकर कुछ पढ़ना - लिखना भी चाहता हूँ । बाबा ने कहा -एक सप्ताह ठहरो , हम तुम्हें काशीजी कबीरचौरामठ पहुँचा देंगे । 

विवेकदास का मूलगादीमठ में आगमन -

काशी में मूलगादीमठ में आगमन सन् 1971 सितम्बर महीने की बात है । तारीख याद नहीं है । बाबा रामदास के साथ और भी कई सन्त थे । जो भी ट्रेन रही हो । काशी स्टेशन पर उतरकर भैंसा - घाट में गंगा स्नान करके , हमलोगों ने रामजानकी मंदिर में प्रसाद ग्रहण किया था । शाम को करीब 6 बजे फक्कड़ बाबा रामदास ने कबीरचौरामठ मूलगादी में लाकर मुझे छोड़ दिया और कहा लो यह तुम्हारा कबीरचौरामठ है । मठ में मुझे छोड़कर बाबा लोग तुरन्त वापस चले गये । मैं तत्कालीन महन्तजी की गद्दी के सामने काफी देर तक खड़ा रहा । काफी देर के बाद महन्तजी अपने कमरे से बाहर निकले । खड़े - खड़े महन्तजी को मैंने नमस्कार - बन्दगी की और निवेदनपूर्वक कहा — मैं यहाँ रहकर कुछ जानना और पढ़ना चाहता हूँ । अर्द्ध - साधु जैसा मैंने वेश बना रखा था । सिर पर बड़े - बड़े बाल थे । महन्तजी ने अपनी डब्बी से चवन्नी सिक्का निकाला और मेरी तरफ फेंकते हुए कहा — यहाँ कोई स्कूल खुला है । एक साथ पाँच नाम पुकारे रामदास , श्यामदास , मोहनदास आदि , इसको गेट से तुरन्त बाहर करो । पाँच साधु मेरे ऊपर लिपट पड़े और मेरी गर्दन पर हाथ पकड़कर मठ से बाहर कर दिया । शाम का समय था अंधेरा हो रहा था । आगे - पीछे कुछ भी सूझ नहीं रहा था । स्टेशन जाने का मन बना लिया था । मठ के बाहर गली में ही कबीर आदर्श संस्कृत महाविद्यालय का बोर्ड दिखा मैं विद्यालय प्रांगण में घुस गया । कई साधु विद्यार्थी दिखे । वहीं पर प्रबन्धक जैसा आदमी भी था । मैंने यहाँ पर रहने का निवेदन किया तो उन्होंने कहा- मठ में चले जाइये । यहाँ पर मेस बन्द हो गया है । मेस चालू होगा तो आपको यहाँ रख लिया जायेगा ।

मैंने कहा- अभी तो मैं मठ से ही आ रहा हूँ । वहाँ से महन्तजी ने खदेड़ कर मुझे भगा दिया । प्रबन्धकजी ने एक साधु को मेरे साथ भेजा और कहा- जाकर इनको मठ में रखवा दीजिये । तेज - तर्रार लड़का दिखता है । मैं लौटकर आया और पत्थर वाले मंदिर के कोने पर तौलिया बिछाकर बैठ गया । पौने घंटे तक उस साधु विद्यार्थी की महन्तजी से चर्चा होती रही । साधु विद्यार्थी से महंतजी की क्या बात हुई मुझे उस विद्यार्थी ने मुझे कुछ नहीं बताया । सिर्फ जाते - जाते कहा- रहिए कुछ नहीं कहेंगे । कुछ देर के बाद महन्तजी कमर पर लाठी लिए मेरे पास पहुंच गये । कहने लगे कि फिर तुम आ गये । हमने हाथ जोड़कर कहा- महाराज ! रात बीतायेंगे । मेरे पास अपना खाने - पीने का सामान है । महन्तजी ने कहा- जाओ बरामदे में आसन लगा लो । राहत की साँस मिली । बगल में ही दो युवक साधु भी बैठे थे । उनसे हमने पूछा- आप लोग यहाँ पर रहते हैं । हम भी यहाँ पर रहना चाहते हैं । कैसे रहा जायेगा । उनमें से एक साधु ने कहा- बगल में कोठारीजी महाराज हैं । यही तो यहाँ के सर्वेसर्वा हैं । 

मैंने हाथ जोड़कर बन्दगी - नमस्कार किया और कहा- हम यहाँ पर रहना चाहते हैं । मैला - कुचैला कपड़ा पहना वह गंवार सा आदमी था । बात - बात में गालियाँ निकालता था । एक दर्जन कामों की लिस्ट गिनायी और कहा ये सब काम करना पड़ेगा । बर्तन - माँजने से लेकर खेत में काम करना , आटा पिसाने चक्की पर गेहूं लेकर जाना और आटा सिर पर रखकर लेकर आना । ये सारे काम शक्ति के बाहर थे फिरभी , हमने स्वीकार कर लिया । सबसे पहले बर्तन - माँजने के लिए लगाया गया । लकड़ी के चुल्हे पर भोजन बनता था । बर्तन जला एवं कालिख पुता रहता था । बहुत कोशिश के बावजूद भी बर्तन साफ नहीं होता था ।

गाँव - घर में पानी पीते थे तो ग्लास तक भी नहीं माँजते थे । मठ में एक काली सी गाय थी । एकदम बिगडैल । मोहल्ले के यादव लोग भी उसे नहीं दूह पा रहे थे । मैं अपनी तरकीब से गाय को दूहने में सफल हो गया । सुबह - शाम गाय दूहने की सेवा लग गयी और मठ में रहने की अनुमति मिल गयी । महन्तीजी प्रतिदिन छह बजे प्रातः डी 0 ए 0 वी 0 कॉलेज के मैदान में घूमने जाते थे । वे मुझे भी साथ लेकर जाने लगे । लौटकर आने पर नीचे चटाई पर बैठते थे और मुझे भी बैठाकर कुछ कथा - कहानी , इतिहास आदि बताते रहते थे । मठ में रहते हुए करीब चार महीने का समय बीत रहा था ।

विवेकदास का पुनः घर आना -

 एक दिन अचानक पोस्टमैन आया । मेरे नाम पर चालीस रुपये का मनीआर्डर आया था । तुरन्त चले आईये का संदेश भी लिखा था । मैंने महन्तजी से कहा- मुझे गाँव जाना पड़ेगा माँ ने मनीआर्डर और सन्देश भेजा है । महन्तजी की आखें डबडबा गयीं थीं । बोले क्यों जा रहे हो । कब तक आओगे । महन्तजी अपने कमरे में गये और बड़े - बड़े नोट वाले दस - दस के 4 नोट हाथ में थमाते हुए कहा जल्दी चले आना । लौटकर आने के लिए हाँ तो भर दी । सन् 71 में लोकसभा का चुनाव हो रहा था । हमारे एक मित्र लोकसभा का चुनाव  लड़ रहे थे । उन्होंने ही माताजी के नाम पर मनीआर्डर भिजवाया था । घर जाकर सामाजिक - राजनैतिक कार्यों में व्यस्त हो गया । गाँव - घर के लोग चाहते थे कि ये अब बनारस न जाये । एक दिन एक साधु मिले । उन्होंने बताया कि कबीरचौरामठ के महन्त श्री रामविलास साहब की मृत्यु हो गयी है । यह खबर सुनते ही मैं बहुत परेशान हो गया और तुरन्त बनारस आने की तैयारी में लग गया । मेरी नजरों के सामने से आचार्यश्री का स्वरूप हट नहीं रहा था । 

विवेकदास का पुनः मूलगादीमठ में आना - 

जब मैं मूलगादीमठ में लौटकर आया तो मूलगादीमठ पर आचार्य महंत श्री अमृतदासजी साहब विराजमान थे । उन्होंने भी जाते - आते देखा था कि मैं बर्तन - माँजने का काम करता था । एक - दो दिन के बाद तत्कालीन महन्तजी ने भी बर्तन - माँजने की सेवा सौंप दी । दो चार दिन बर्तन - माँजने के बाद मैंने महंतजी को बताया कि मैं सिर्फ बर्तन - माँजने के लिए पैदा नहीं हुआ हूँ ।

गाँव में पैदाइस भले है तो भी इतने ही समय में हम इलाके में बड़े बड़े काम करके आये हैं । कबीर साहब की वाणी पढ़ने के बाद तन - मन सब वैरागी तो हो गया है । फिरभी , लोकहित में काम करने की इच्छा है । शुरु - शुरु में जब मैं मठ में आया था तो यही बात मैंने पूर्व महंतजी से भी कही थी तो पूर्व महंतजी ने एक पल में मुझे मठ परिसर से बाहर करवा दिया था । फिर किसी तरह मठ में प्रवेश किया तो महंतजी बहुत ही प्यार करने लगे थे । उनके प्यार की वजह से ही दुबारा लौटकर मठ में आया हूँ । लेकिन अब आप भी मुझसे बर्तन - मॅजवाने लगे हैं । महन्तजी ने कहा - तब तुम क्या करना चाहते हो । मैंने महन्तजी से कहा - मैं जो करना चाहता हूं । वह मेरे वश में नहीं है । महन्तजी को लगा यह व्यक्ति दो टूक बातें कर रहा है । यह तो बहुत ही निर्भीक व्यक्ति है । फिर महन्तजी ने पूछा - बताओ तो तुम क्या करना चाहते हो । मैंने कहा - महन्तजी ! मठ के बारे में आपके पास कोई योजना है । मैं तो मठ को चाँद - सितारों तक पहुँचाने की क्षमता रखता हूँ । ऐसी क्षमता मेरे पास है । मैं जो चाह लेता हूँ सो करता हूँ । आप मठ के विकास की योजना तैयार करिये । फिर देखिये मैं क्या करता हूँ । महन्तजी ने कहा - ठहरो , मठ का मैं नये सिरे से निर्माण करना चाहता हूँ । बनारस में सीमेंट का बहुत अभाव है । क्या तुम सीमेंट ला सकते हो ? मैंने कहा - सीमेंट क्या , क्या सीमेंट का कारखाना लगवा सकता हूँ । यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन मेरी बातों में सतप्रतिशत दम होता है । यह छोटा मुँह बड़ी बात अवश्य है । ऐसी बातों को ज्यादतर लोग पसन्द नहीं करते हैं । 

मूलगादीमठ का विकास -

बिहार गया मठ के करोड़ों रुपये की जमीन बेची जा रही थी । मैंने कहा — मुझे एक साईकिल और मठ का एक लेटर पैड चाहिए । मठ में एक जर्जर सी साईकिल थी । मठ का कोई पैड नहीं था । मैंने स्वयं मठ का एक लेटरपैड छपवाया । उस लेटर पैड पर एक आवेदन तैयार किया और इस आवेदन को लेकर सीधे मैं वाराणसी के कलेक्टर साहब के बंगले पर पहुँचा । अर्दली से बात करके अन्दर पहुँचा गया ।

उस वक्त महेशप्रसादजी कलेक्टर थे । कलेक्टर साहब ने पूछा कहाँ से आये हो । कबीरमठ का नाम लेते ही आवेदन पर कुछ लिखा और कहा — आपूर्ति कार्यालय चले जाओ । तब आज के डी आई . जी . कार्यालय के ठीक सामने टूटे फूटे से घर में आपूर्ति कार्यालय था । मैं एस 0 डी 0 एम 0 साहब के कमरे में घुस गया । एस 0 डी 0 एम 0 लईक अहमद थे । ऐसा सज्जन शरीफ अफसर तो मैंने आज तक नहीं देखा । उन्होंने मुझसे पूछा – कहाँ से आये हो । मैंने बताया- कबीरमठ से । इतना सुनते ही लईक अहमद साहब मेरे गले मिल गये और उन्होंने कहा - मैं भी कबीरपंथी हूँ । जैसा भी होगा खूब मदद करेंगे । सीमेंट तो परमिट पर दो - चार बोरी मिलता है । आपको कितनी बोरी सीमेंट चाहिए । मैंने कहा - कल महन्त जी से पूछकर बताऊँगा । महन्तजी ने कहा निर्माण का काम तो बहुत बड़ा है और लम्बा है । जितनी बोरी मिलती है उतनी बोरी ले आओ । लईक साहब ने कहा - ज्यादा शोर - शराबा मत करना । पहली ही किस्त में उन्होंने 30 बोरी का परमिट बना दिया । उस समय पूरे देश में सीमेंट का अभाव चल रहा था । महन्तजी से कहा - सीमेंट तो मैं जितना चाहूँगा लाकर दूंगा लेकिन मेरी एक शर्त है , मठ में सबसे पहले एक पुस्तकालय का निर्माण कराइये । तब मैं सीमेंट लाकर दूंगा । इस पर महन्तजी खुशी - खुशी तैयार हो गये । मठ के मेन गेट पर ही ऊपर एक हॉल और दो कमरों को पुस्तकालय के लिए प्रस्तावित किया गया । पुस्तकालय का निर्माण होते ही मैं पुस्तकालय के लिए कबीर - साहित्य खरीदकर लाने के प्रति दीवाना हो गया । जहाँ भी जैसे भी मुझे कबीर - साहित्य की सूचना मिलती थी तो उसे मैं तुरन्त बाजार से खरीद कर लाता था । खरीदकर लाने के साथ ही इन पुस्तकों का अध्ययन भी करता जाता था । इसलिए मुझे पता है कि किस किताब के किस पंक्ति में क्या लिखा है । तीन साल में बड़ी तेजी से मठ का जीर्णोद्धार हो गया । इस समय तक पुस्तकालय में पुस्तकें भी काफी संख्या में आ गयीं । पूर्व महन्त गंगाशरणदास ने एक कबीर जीवन चरित्र तैयार किया । इस पुस्तक का विमोचन रेल मंत्री पं ० कमलापति त्रिपाठीजी ने मठ में आकर किया । मठ में प्रकाशन और समारोह की शुरुआत हुई । कबीरवाणी प्रकाशन केन्द्र की स्थापना हुई । पुस्तकालय के लिए पुस्तक खरीदने और उन पुस्तकों का अध्ययन करते - करते मैं भी कबीर- साहित्य का कुछ - कुछ जानकार हो गया । क्योंकि जितनी किताबों को मैं खरीदकर लाता था उसका पूरा अध्ययन करते जाता था । मठ में इस समय तक मेरी पूरी पकड़ बन चुकी थी । गंगाशरणदास इस समय मठ के अधिकारी पद पर थे । मेरी सक्रियता से वे खुश नहीं थे लेकिन महन्तजी मुझसे बहुत प्रभावित हो चुके थे । अधिकारी गंगाशरणदास के विरोध के बावजूद मैं भारी पड़ता था । महंतजी सीधे और सरल सन्त थे । वे मठ का पूर्णतः विकास चाहते थे । इसलिए महन्तजी हमारी योजना से पूर्ण सहमत रहते थे । अधिकारी गंगाशरणदास के कारण मुझे कई बार मठ छोड़ कर उनके घर बाहर जाना पड़ा था । फिर बुलाने पर लौटकर आता था ।

  कबीर बीजक  का विमोचन -

 मठ के बगल में कबीर आदर्श महाविद्यालय है । इस विद्यालय में डॉ ० शुकदेव सिंह द्वारा सम्पादित ' कबीर बीजक ' का विमोचन समारोह था । इस समारोह में हिन्दी - साहित्य के बड़े - बड़े विद्वान पधारे थे । आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी , पं 0 परशुराम चतुर्वेदी , डॉ 0 केदारनाथ द्विवेदी , हनुमानदास षडशास्त्री आदि सन्तों और विद्वानों की उपस्थिति थी । मैं भी समारोह देखने और सुनने गया था । मुझे नहीं पता था कि इतने बड़े - बड़े भी लोग कबीर साहब के पक्षधर हैं । डॉ ० शुकदेव सिंह ने कबीर साहब की प्रासंगिकता पर व्याख्यान दिया था । समारोह में वे अधिक व्यस्त थे । बातचीत नहीं हो सकी थी । किसी परिचित सन्त को लेकर मैं एक दिन गया । मैंने उनसे बताया था कि कबीरमठ से आया हूँ । कबीर साहब के ऊपर काम करना चाहता हूँ । आपकी मदद चाहिए । उन्होंने बताया कि सबसे पहले मैं कबीरमठ में ही गया था । उस समय आचार्य रामविलास साहब मूलगादीमठ पर महन्त के रूप में विराजमान थे । उन्होंने बीजक पर काम करने में मेरी कोई मदद नहीं की । उलटे कहा - गृहस्थ बीजक पर क्या काम करेगा । बीजक आध्यात्मिक ग्रंथ है । साधु - सन्त पढ़ते हैं और पाठ - पूजा करते हैं । तब मुझे महंत रामरूप गोस्वामी मिले और मैंने भगताही बीजक - पाठ पर काम किया । मेरे बीजक सम्पादन से साहित्य जगत् में बीजक पढ़ने - पढ़ाने की परम्परा की शुरूआत हुई है । दूसरे ही दिन डॉ 0 शुकदेव सिंह मठ में आये । शुकदेव सिंह को भी कबीर पर काम करने का शौक था । उनको भी मेरी बात सुनकर बेहद प्रसन्नता हुई और मेरी उनकी दोस्ती कायम हुई । मैं उनके घर बराबर आने जाने लगा और वे भी बीच - बीच में मुझसे मिलने मठ में आने लगे । इनके द्वारा बड़े - बड़े साहित्यकारों से भी मेरा परिचय होने लगा । उनका विद्यालय में जो कबीर साहित्य की प्रासंगिकता पर व्याख्यान हुआ था , मेरे कानों में अभी तक गूंज रहा था । कबीर बीजक विमोचन समारोह के पहले मुझे मचने लगा । नहीं पता था कि इतने बड़े - बड़े लोग भी कबीर साहब के पक्षधर हैं । बड़े बड़े साधु महन्त भी भारी संख्या में पधारे थे । मेरी आस्था और भी बढ़ी । कबीर साहब पर काम करने की मनसा और तेज हुई । शुकदेव सिंह की वजह से मेरे पास हिन्दी के लोगों के प्रति मेरी श्रद्धा और भी बढ़ने लगी । मेरा उत्साह इतना बढ़ गया कि मठ में कामों को लेकर तूफान इसी बीच एस 0 अतिबल नामक एक पत्रकार से मुलाकात हुई । वे भी काफी उत्साही व्यक्ति थे । वे भी मठ में मेरे पास बराबर आने लगे । इनकी वजह से पत्रकारिता जगत् में भी मेरी पहचान बनने लगी । लोगों का आना - जाना शुरु हो गया । 

कबीर की प्रासंगिकता -

एस 0 अतिबलजी सक्रिय पत्रकारों में से थे । इनकी पैठ - पहचान पत्रकारिता जगत् में काफी थी । मैं भी इनके माध्यम से अधिकतर पत्रकारों से जुड़ता गया । जो भी लोग अतिबलजी से मिलने आते थे , उनको कबीरमठ में जरुर लाते थे । वे धीरे - धीरे साहित्यिक दुनिया और पत्रकारिता जगत् में मेरा दायरा बहुत अधिक बढ़ गया था । मठ की खबरें अखबारों में आने लगीं । इसके पहले बनारस के लोगों के लिए मठ शून्य डिग्री पर था । दूसरी तरफ हिन्दी के लोगों को शुकदेव सिंह मठ में लेकर आने लगे । धीरे - धीरे मठ की गतिविधियाँ तेज होने लगीं । डॉ ० शुकदेव सिंह हर दूसरे - तीसरे दिन मठ में आने लगे । मेरे अन्दर बहुत सारी योजनाएँ थीं और तब मेरा उत्साह बहुत अधिक बढ़ता चला जा रहा था । मुझे लग रहा था कि इतने सारे साहित्यिक विद्वानों से सम्पर्क बन रहा है तो क्यों नहीं मठ की तरफ से एक - दो किताबों का सम्पादन किया जाये । डॉ ० शुकदेव सिंह से एक परिपत्र तैयार करवाया इस परिपत्र में सौ से भी अधिक लेखों की सूची शामिल थी । दो महीने के भीतर सौ से भी अधिक लेख मेरे पास आ गये । आलेखों की सूची में एक शीर्षक कबीर की प्रासंगिकता पर था । सबसे ज्यादा लेख इसी विषय पर आये । मैंने दूसरी किताब कबीर साहित्य की प्रांसगिकता विषय पर तैयार की । दोनों किताबों का सम्पादन सम्पन्न हुआ । 1978 आते - आते दोनों पुस्तकें छपकर तैयार पुस्तकों का विमोचन किया । 

इस समारोह में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी , हो गयीं । 1978 में उ 0 प्र 0 के मुख्यमंत्री रामनरेश यादव थे । उन्होंने दोनों ठाकुर जयदेव सिंह , करुणापति त्रिपाठी और राजबली तिवारी शिक्षा राज्य मंत्री भी उपस्थित थे । यह विमोचन समारोह वाराणसी के लिए ऐतिहासिक था । मठ में सब लोगों ने लंगर भी चखा था । चार घंटों तक मठ में मुख्यमंत्री का रहना सामान्य बात नहीं थी । मठ वाराणसी के जन - मन में चर्चित हो गया । मुख्यमंत्री रामनरेश यादव मठ के भक्त भी हो गये थे । हम तो मठ के आन्दोलन को लेकर पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से चर्चित हो ही रहे थे । 

विवेकदास का अनशन -

1980 के आस - पास एक महत्वपूर्ण घटना घटी । दोनों महाराज आचार्य महन्त अमृतदास और अधिकारी गंगाशरणदास तीन महीने के लिए गुजरात दौरे पर गये हुए थे । व्यवस्था संचालन के लिए तीन लाख रुपये मुझे दे गये थे । एक दिन शाम को टहलते हुए हम कबीर - तिराहे पर गये तो तिराहे पर एक पैटस्टल तैयार हो रहा था । मोहल्ले के कुछ कथक और कुछ विदेशी जन वहाँ काम करवा रहे थे । मैं देखकर चौंका और उन लोगों से पूछा तो झड़पते हुए जवाब मिला - तुम्हें क्या मतलब ! अगल - बगल के लोगों ने बताया कि ये तबला वादक शारदा सहाय हैं । लन्दन में रहते हैं और यहाँ वे अपने पूर्वज तबला के महान वादक राम सहाय की मूर्ति लगवा रहे हैं । दो - तीन के बाद विख्यात गायिका लता मंगेशकर मूर्ति का अनावरण करने आने वाली थीं । बलिया के कोई पाण्डेय जी हैं उन्होंने अनुमति दी थी । वे उत्तर प्रदेश के नगर - विकास मंत्री थे । उन्होंने वाराणसी शहर के सभी अधिकारियों को मैनेज कर रखा था । इसलिए वाराणसी के सभी अधिकारी या तो छुट्टी पर थे या वाराणसी से बाहर थे । मैं उस समय चेतक स्कूटर पर चलने लगा था । स्कूटर से अधिकारियों के पास दौड़ने लगा ।

उस दिन तो नगर - निगम से लेकर जिला प्रशासन के समस्त अधिकारी शहर से बाहर थे । मैंने रातो - रात शहर के सौ से भी अधिक साधुओं को मठ में एकत्रित कर लिया । गाँधीजी की नीति का सहारा लिया और दस टीम बनाकर अनशन के लिए तैयार कर लिया । मुझे लग रहा था कि साधुओं की गिरफ्तारी होगी । इसलिए मजबूत - मजबूत साधुओं की पहली टीम तिराहे पर बैनर लगाकर बैठा दिया । पाँच दस मिनट सम्बोधित करके सबको हिम्मत देकर मैं कचहरी चला गया । कचहरी में अधिवक्ता बार संघ के मंत्री या अध्यक्ष थे मिश्रीलालजी । उन्होंने मेरी बड़ी मदद की । सौ से भी अधिक वकीलों का हस्ताक्षर करवा कर उनहोंने मुझे दिया । उसे लेकर डी 0 एम 0 साहब के कार्यालय में पहुँचा । उस दिन डी 0 एम 0 ए 0 के 0 दास कार्यालय में उपस्थित थे । सौ वकीलों और दो दर्जन साधुओं के हस्ताक्षर वाला आवेदन डी 0 एम 0 साहब को थमाते हुए मैंने कहा - डी 0 एम 0 साहब कल मुर्हरम का दिन है । कबीर तिराहे पर मूर्ति निर्माण का कार्य नहीं रुका तो बनारस में हिन्दू - मुस्लिम का दंगा होगा । कबीरपंथी हिन्दू भी हैं और मुस्लिम भी । इतना सुनते ही डी 0 एम 0 साहब सजग हो गये । उन्होंने तुरन्त कप्तान साहब को फोन किया । कप्तान साहब पी 0 ए 0 सी 0 बल लेकर कबीरचौरा के कबीर तिराहे पर पहुँच गये । थाने में मेरी बातचीत पहले ही हो गयी थी । थानेदार पूर्व परिचित थे । उन्होंने कहा था कि ऊपर से आदेश दिला दीजिये तो हम पेस्टल तोड़वाकर थाने में जमा करवा देंगे । हम अभी कचहरी में ही थे उधर साधुओं को तिराहे से हटवाकर मूर्ति के लिए हुए निर्माण कार्य को ध्वस्त कर दिया गया और घोषणा की गई कि आगे के निर्णय तक कोई निर्माण कार्य नहीं होगा । मेरी तो 80 प्रतिशत जीत हो गयी । लेकिन नगर विकास आवास मंत्रालय में स्वीकृति को कैंसिल कराना जरुरी था । इसी समय लोकसभा का चुनाव हो रहा था । वाराणसी लोकसभा से राजनारायणजी और पं 0 कमलापति त्रिपाठी आमने - सामने चुनाव लड़ रहे थे । तब तक बनारसीदास उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हो गये थे । बनारसीदास राजनारायण के खास आदमी थे । मैं नदेसर कोठी में दो बजे रात्रि में राजनारायण से मिला और कहा कि बनारसीदासजी से कह दीजिये कि कबीर - तिराहे का प्रस्ताव कैन्सिल करवा दें । राजनारायण ने मुझसे झड़प कर कहा - कितने कबीरपंथी हैं बनारस में जाओ पहले मुझे वोट दिलवाओ फिर देखते हैं क्या होता है ।

 कबीरदल का पुनर्गठन -

 23 दिसम्बर की रात में मेरी राजनारायणजी से बात हुई थी । बहुत ही कम समय था मेरे पास । तुरत - फुरत दस बारह भक्तों को गाँव गाँव में भेजकर , 25 दिसम्बर को मठ में विशाल भण्डारा है ' , ऐसा मैंने क्षेत्र में निमंत्रण भिजवा दिया । भण्डारे के नाम पर मठ में भारी भीड़ जमा हो गयी । फिर मैंने ' आज ' अखबार में आधा पेज का विज्ञापन छपवाया कि कबीरदल पुनर्गठित हुआ है । यह सनसनीखेज राजनैतिक नारों से ओत प्रोत था । बनारस शहर में इस विज्ञापन से हलचल मच गयी । 25 दिसम्बर को कबीर - तिराहे से पाँच हाथी , पाँच घोड़े और तीन ऊँटों और पाँच बैलगाड़ियों का शानदार जुलूस शहर में निकाला गया । हजारों लोगों के हाथों में कबीर साहब के दोहों के बैनर थे ।

बैनर और राजनैतिक नारों से गूंजता हआ शहर में कबीरपंथियों का परिक्रमा शुरू हुई । बनारस के लोग दंग रह गये थे कि ऐसा जूलूस तो कोई राजनैतिक दल भी नहीं निकाल पाता है । राजनैतिक पार्टियों के बड़े - बड़े नेतागण भी जूलूस में शामिल थे । मैंने एक दिन के भीतर इतना भारी जूलूस निकाल कर दिखा दिया कि हमारे पास कितना वोट बैंक है । राजनारायणजी के लोग भी भारी संख्या में जूलूस में शामिल थे । दूसरे ही दिन हमारे पास डॉ 0 आनन्द कुमार और आलोक कुमार पहुंचे । उन्होंने कहा — कबीरदल गठन के बारे में आप से बातचीत करनी है । आगे कबीरदल का कैसा और क्या - क्या कार्यक्रम है । आनन्द कुमार जी को विस्तार से कबीरदल के कार्यक्रम के बारे में बताया । कबीरदल कार्यक्रम की योजना भी प्रकाशित थी । एक माह के भीतर ही राष्ट्रीय पत्रिका ' दिनमान ' ' काशी के कबीरपंथी ' कवर - स्टोरी के साथ बाजार में आई । दिनमान में पाँच पेज की यह स्टोरी छपने से देशभर में तहलका मच गया । मैं बौद्धिकों , राजनैतिकों और समाजकचिन्तकों के बीच एक नायक बनकर उभरा । सैकड़ों लोगों ने बनारस में आकर हमसे सम्पर्क किया और राजनैतिक और सामाजिक आन्दोलन की चर्चा की । 

कबीरदल -

कबीरदल ऐसा नाम था कि लोगों को लगने लगा था कि मैं चुनावी राजनीति करूंगा । लेकिन मुझे कबीर साहब के संदेशों का प्रसार करना था । कबीर वाणी के साये में सामाजिक चेतना की अलख जगानी थी , राजनीति नहीं करनी थी । इसलिए मैंने धीरे - धीरे कबीरदल की गतिविधियाँ बंद कर दीं । उस समय कबीरदल के ही माध्यम से एक और कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी । भागलपुर जिले के कहलगांव के पास वटेश्वर स्थान विक्रमशिला में सात दिवसीय कबीर शिविर का आयोजन होने वाला था । जिसमें मैंने लगभग पाँच सौ युवक साधुओं को वटेश्वर स्थान में बुलाया था । इस कार्यक्रम का ऐसा परिपत्र तैयार किया गया था कि मानो देश में कोई एक नया आन्दोलन शुरू होने वाला है । इस परिपत्र के आधार पर डॉ ० धर्मवीर भारतीजी ने ' धर्मयुग ' पत्रिका में एक भेंटवार्ता प्रकाशित की । उस समय धर्मयुग घर - घर में पढ़ी जाने वाली पत्रिका थी । दो पेज की इस भेंटवार्ता में मैंने आग उगल कर रख दी थी । बातचीत में कम्युनिस्ट पार्टियों को राजनैतिक हलकों में ध्वस्त कर दिया था । इस भेंटवार्ता का शीर्षक ही था कि देश को कम्युनिस्ट नहीं कबीरपंथी दिशा देंगे । इस भेटवार्ता से मेरी नक्सलवादी छवि दूर हो गयी थी । देश को वास्तविक मार्ग कबीरपंथी ही बतायेंगे । ऐसा मैंने ' धर्मयुग ' पत्रिका से संदेश प्रसारित किया था । इस पत्रिका के बाजार में आते ही मुझे एक बार फिर मठ छोड़कर जाना पड़ा था ।

' धर्मयुग ' और ' दिनमान ' साप्ताहिक पत्रिका में इतनी बड़ी - बड़ी खबरें छपना सामान्य बात नहीं थीं । मेरे समानान्तर और मेरे से ऊपर के लोगों को लगने लगा था कि मैं महन्ती के लिए दावेदार हो जाऊँगा । लेकिन ऐसी कोई बात नहीं थी । मैं तो तन मन से वैरागी था । कहीं से भी महंती की मनसा नहीं थी । लेकिन मेरे बढ़ते प्रभाव से सबलोग परेशान और ईर्ष्याग्रस्त थे । प्रायः महंतजनों का ढोंग , पाखण्ड और कर्मकांडी प्रवृत्ति देखकर मैं स्वयं ही बहुत पीड़ित और दुःखी था । महन्त बनने के लिए चेले , महन्त गुरुओं का तलुवा घिस - घिस कर चिकना कर देते हैं , तब कहीं जाकर महन्ती की पदवी मिलती है । मैंने तो चालीस वर्षों में गुरु को एक ग्लास पानी भी कभी नहीं पिलाया होगा । लेकिन लोगों के भीतर पैदा हुई शंका की बीमारी को कैसे दूर कर सकते हैं । मठ में मैंने कुछ सक्रिय कार्यक्रमों का ऐसा जाल फैला दिया था कि हमारे बिना अब मठ में एक पत्ता भी हिलने की सम्भावना नहीं थी । इसलिए लाचार होकर मुझे फिर से मठ में बुलाना ही पड़ा । 

कबीर जयन्ती -

इसी समय उत्तर प्रदेश में वी 0 पी 0 सिंह के मुख्यमंत्रीत्व काल में ठाकुरप्रसाद सिंह उ 0 प्र 0 सरकार के सूचना निदेशक हो गये थे । ठाकुर प्रसाद सिंह इसके पहले मठ के कई कार्यक्रमों में शामिल हो चुके थे । वे नाटी इमली के रहने वाले थे और बहुत बड़े कवि थे । ठाकुरप्रसाद सिंह ने एक दिन मुझे फोन किया और कहा इस वर्ष कबीर - जयन्ती के अवसर पर हम सूचना - विभाग की ओर से तीन दिवसीय बड़ा समारोह करेंगे । कबीर - स्थलों की हम एक प्रदर्शनी भी तैयार करवा रहे हैं । उत्तर प्रदेश पत्रिका को हम इस बार कबीर अंक के रूप में प्रकाशित करेंगे । आपका सहयोग चाहिए । आप लोग भी इस अवसर पर कुछ प्रकाशित करिये । " मुझे लगा कि दोनों महाराज गुजरात की यात्रा पर हैं । कुछ नया काम करना चाहिए । डॉ ० शुकदेव सिंह की मदद से ' साधमता है सार ' स्मारिका की योजना तैयार की । इक्कीसवें आचार्च रामविलास साहब से शुरुआती समय में मैंने बहुत कुछ सुना था । वह सब बातें मेरे स्मृति पटल पर अंकित था । मैंने डॉ . शुकदेव सिंहजी को सबसे पहले कबीरचौरामठ मूलगादी का इतिहास और फिर पीठ के सभी आचार्यों का इतिहास बोलकर लिखवाया । कुछ आचार्यों के चित्र फाइल में थे कुछ कल्पना द्वारा निर्मित करवाया । 

कबीर - जयन्ती आते- आते एक भव्य स्मारिका प्रकाशित हो गयी । इस स्मारिका के प्रकाशन के दौरान मैंने मठ के कबाड़ से अनेक ऐतिहासिक चीजों को भी खोज निकाला था । कबाड़ से निकली चीजों से ही आज मठ का इतिहास तैयार हो सका है । इस कबाड़ में अनेक अखबारों की प्रतियाँ थीं । 1953 में मठ में एक बहुत बड़ा सम्मेलन हुआ था । इस अवसर पर एक पत्रिका भी प्रकाशित हुई थी । इस जीर्ण - शीर्ण पत्रिका में आजादी की लड़ाई में मठ की भूमिका पर विशेष लेख छपे थे एवं मठ से जुड़े तमाम सेनानियों के आलेख संकलित थे । पत्रिका पढ़ी नहीं जा रही थी । किसी तरह से मैंने इस पत्रिका को सुरक्षित करके लेखों की कॉपी करवायी । 1953 में इलाहाबाद में कुम्भ मेला भी लगा था । कहते हैं कि इस कुम्भ मेले में साधुओं के कन्धों पर सिर्फ सत्य कबीर की चादरें ही दिखती थीं । बहुत सारी चादरें साधुओं और भक्तों को बाँटी गयी थीं । देश आजाद हो गया था । आजादी की लड़ाई में मठ की महत्वपूर्ण भूमिका थी । इसी खुशी में यह महोत्सव किया गया था । इस महोत्सव के बाद मठ को नये सिरे से सजाने और धार्मिक कार्यक्रम शुरू करने का संकल्प लिया गया था । क्योंकि पौने दो सौ वर्ष तक मठ की धार्मिक गतिविधियाँ ठप्प पड़ी हुई थीं । कबीर - जयन्ती के कुछ ही दिन बचे थे । दोनों महाराज गुजरात यात्रा से वापस लौट आये थे । मैं तीन लाख रुपयों का हिसाब महन्तजी को देने गया तो 40 हजार रुपये स्मारिका का खर्च बताया । इतना सुनते ही महन्तजी गुस्से में आग - बबूला हो गये और मुझे इतनी फटकार लगायी कि मेरी सिट्टी - पिट्टी गुम हो गयी और कुछ समय के लिए मठ छोड़कर मैं बाहर चला गया । जाने से पहले मैंने बताया था कि मठ का इतिहास और परम्परा जो लुप्त हो गयी थी , उसे इस स्मारिका के माध्यम से हमने फिर जिन्दा कर दिया है । कबीर - जयन्ती महोत्सव में यह स्मारिका बाँटी गयी । जब लोगों ने मठ का इतिहास और परम्परा को पढ़ा तो स्मारिका लोगों को बेहद पसन्द आयी ।

 पहली बार मठ का इतिहास और परम्परा तथा आचार्यों का जीवनवृत्त सिलसिलेवार तैयार किया गया था । बाइस आचार्यों के चित्र भी सबके सामने आये । 

दो महीने बाद महन्तजी ने खबर भिजवाई कि जल्द से जल्द मठ में वापस आ जाओ । मठ में कोई बड़ी समस्या आन पड़ी थी । यह तो बुलाने का एक बहाना मात्र था । स्मारिका की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी । मेरे जाने का महन्तजी पश्चाताप कर रहे थे । मैंने महन्तजी को खबर भेजी कि चालीस हजार रुपये माँग - माँगकर जब तक जमा नहीं हो जायेगा , तब तक मठ में वापस नहीं आऊँगा । महन्तजी बार - बार खेद व्यक्त कर रहे थे । जब मेरे ऊपर चारों तरफ से दबाव आने लगा , तब मैंने मठ की तरफ प्रस्थान किया । ऐसी घटनाएँ एक बार नहीं मेरे साथ अनेक बार हो चुकी थीं । मुझे जिद्द चड़ती थी तो मैं मठ छोड़कर चला जाता था । कबाड़ के बन्डल में ' आज ' अखबार की अनेक प्रतियाँ मिलीं थीं । ' आज ' की एक ऐसी प्रति थी कि पेपर छूने पर फट जाता था । 

गाँधीजी का मठ में आना -

सन् 1934 में गाँधीजी मठ में आये थे । यह खबर छपी थी । अखबार की प्रति गल - पच गयी थी । मैंने चार हजार रुपये ' आज ' कार्यालय में जमा करके नयी प्रति मँगवायी जिसको आज भी शीशे में मढ़ कर रखा गया है । कुछ और भी प्रतियाँ मिली जिसमें ' कांग्रेस समिति ' की बैठक की सूचना प्रकाशित थी । एक प्रति में पंडित जवाहर लाल नेहरूजी की मठ में आने की खबर थी । दो बार नेहरूजी के मठ में आने की खबर प्रकाशित थी । ' आज ' अखबार ही उस समय वाराणसी से छपता था । एक बार पंडित नेहरू और साथ में कमला नेहरू के आने की खबर थी । कश्मीर के शेख अब्दुल्ला , मोहम्मद किदवई , डॉ ० राजेन्द्र प्रसाद और स्वाधीनता की लड़ाई से जुड़े अनेक लोगों के मठ में आने की खबर और अन्यान्य कार्यक्रमों की खबर से मैंने मठ का इतिहास और परम्परा का दस्तावेज तैयार कराया । ज्यादातर अखबारों से ही मैंने जाना कि कबीरमठ का स्वाधीनता की लड़ाई में कितना बड़ा योगदान था । मैं आचार्य रामविलास साहब इक्कीसवें आचार्य महन्तजी के साथ चार महीने तक मठ में रहा था । उन्होंने ही मठ के संघर्ष की कहानी की चर्चा विस्तार से की थी । चार महीने तक प्रतिदिन मुझे बैठाकर मठ की कहानियाँ और इतिहास सुनाते रहते थे । मेरी समझ में यह नहीं आता था कि इतनी सारी बातें मुझे क्यों सुना रहे हैं । मैं समझता हूं कि आचार्य रामविलास साहब भविष्य द्रष्टा सन्त थे । उनके अन्तर्मन में ज्ञात हो गया था कि यही व्यक्ति मठ की परम्परा और इतिहास को उजागर करेगा । इसलिए मैंने अन्य मूर्तिशिल्पों के साथ परिसर में आचार्य रामविलास साहब का भी मूर्तिशिल्प बनवाया है । मठ के इतिहास और परम्परा के बारे में जब भी कुछ सोचता हूँ तो आचार्य रामविकलास साहब की बातें सामने आती हैं । यदि मैं उनके समय में नहीं आया होता तो आज भी शायद मठ की परम्परा और इतिहास शून्य में ही विलीन रहती । 

आचार्य रामविलास साहब -

रामविलास साहब पच्चास वर्षों तक मूलगादी पर विराजमान रहे हैं । इतने समय तक का अनुभव और किसी के पास नहीं था । उन्होंने अपनी आँखों से बहुत कुछ देखा , समझा और जाना था । उनकी आपा बीती मेरे लिए इतिहास का साक्ष्य बना । मुझे पता होता कि आने वाले समय में मुझे ही मूलगादी की परम्परा का संचालन करना है तो मैं रामविलास साहब से इतिहास और परम्परा की सारी बातें अपने दिल और दिमाग में संजोय लेता । लेकिन ' अब पछताये क्या भया जब चिड़िया चुग गयी खेत ' । हमारे जानते आचार्य रामविलास साहब जैसा महंत कबीरपंथ की परम्परा में न कोई हुआ है और न कोई होगा मेरा ऐसा मानना है । क्योंकि मैंने उनके बारे में जितना जाना और समझा है उसके मुताबिक वे अद्भुत व्यक्तित्व के महन्त थे । मैंने आचार्य रामविलास साहब के बारे में विशेष रूप से अध्ययन किया । वे झारखंड के पलामू जिले के रहने वाले थे । बचपन में ही मूलगादी में आकर गुरुप्रसाद साहब से दीक्षित हो गये थे । गुरुप्रसाद साहब मूलगादी के उन्नीसवें आचार्य महन्त थे । गुरुप्रसाद साहब ने प्रेम साहब को बीसवें आचार्य महन्त के रूप में उत्तराधिकारी महन्त बनाया था लेकिन  प्रेम साहब का गुरुप्रसाद साहब के रहते ही परिनिर्वाण मगहर में हो गया था । उस समय रामविलास साहब हरिद्वार में संस्कृत का अध्ययन कर रहे थे । 

हरिद्वार से बुलाकर गुरुप्रसाद साहब ने इक्कीसवें आचार्य महन्त के रूप में रामविलास साहब का चयन किया । उस समय रामविलास साहब की उम्र 24-25 साल की थी । युवा तुर्क के रूप में महन्त बनकर रामविलास साहब ने मूलगादी के लिए कई नये - नये काम किये । फीजी के भक्तों की मदद से कबीर समाधि मंदिर का निर्माण करवाया और बीजक मंदिर का भव्य निर्माण भी हमलोगों के सामने है । 

अंग्रेज वारेन हेस्टिंग्स से मठ की दुश्मनी -

उस समय देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी । मूलगादीमठ जंगे आजादी की शुरूआत से ही देश को आजाद कराने में लगा हुआ था । रामविलास साहब ने कबीरदल का गठन किया और इस दल में सबको शामिल किया । छोटेदास , बालेश्वरदास , इन्द्रदास इनके मुख्य शिष्य थे । इन लोगों ने मिलकर कबीरदल संगठन को मजबूत बनाया । 1942 में मैदागिन चौराहे पर तिरंगा झंडा फहराने में छोटेदास , बालेश्वरदास और कई साधुओं को गोली लगी थी । आगे छोटेदास और बालेश्वरदास की राजस्थान में जाकर मृत्यु हो गयी थी । काशीनरेश राजा चेतसिंह की वजह से ही अंग्रेज वारेन हेस्टिंग्स से मठ की दुश्मनी हुई थी । इसलिए कबीरदल का आजादी की लड़ाई में ऐतिहासिक महत्व है । पंथ और मूलगादीमठ की परम्परा और इतिहास में आचार्य रामविलास साहब का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए । यह पूर्णतः सच है कि कबीरचौरामठ मूलगादी और काशी नरेशों का संबंध कबीर साहब के समय से ही मूलगादी से जुड़ा रहा है । राजा वीरदेव सिंह बघेल कबीर साहब के परम शिष्यों में थे । मूलगादी मठ और काशी नरेश के राजपरिवार के बीच संबंध आगे भी बना रहा । राज परिवार से मठ को मदद मिलती थी और मठ की शक्ति राजपरिवार को बल प्रदान करने में होती थी । दोनों ही का गौरव काशी में सम्मान से गाया जाता था । जहाँ धर्म और राजनीतिक शक्तियाँ जनता और समाज की बेहतरी के लिए एक साथ हों तो उस परम्परा का कहना ही क्या है । औसानगंज राजपरिवार की तरफ से मूलगादीमठ को 16 बीघे जमीन दान में मिली थी । उसके कागजात आज भी राज परिवार में सुरक्षित है । मूलगादीमठ 16 बीघा जमीनों को सुरक्षित नहीं रख सका है । इस जमीन - परिसरों पर धीरे - धीरे गाँव - घर बस गये हैं । राजा चेतसिंह की माँ पन्नारानी मूलगादीमठ की परमशिष्या थीं । पन्नारानी ने देखा कि मठ का परिसर सिकुड़ता जा रहा है । तब उन्होंने स्वयं अपने साधन से चहारदीवारी करवा कर सुरक्षित किया है । पन्नारानी द्वारा चहारदीवारी बनवाये जाने की वजह से ही मठ परिसर आज सुरक्षित है । पन्नारानी की वजह से भी मठ और राजपरिवार का सम्बन्ध और निजी तौर पर गहरा हो गया था । मठ में तीन कुएँ हैं । तीन कुंओं का निर्माण राजपरिवार के द्वारा हुआ है तीनों कुएँ पर राजपरिवार का नाम अंकित है ।


संत विवेकदास आचार्य 


साहेब बन्दगी। 

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