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संत विवेकदास आचार्य का मार्ग /sant vivekdas aacharya ka marg

 संत विवेकदास आचार्य का मार्ग -

में जहाँ से और जिस परिस्थिति तथा परिवेश में मेरा जन्म हुआ है , वह एक अद्भुत घटना जैसी है। पाठको और भक्तो को यह विश्वास नहीं होगा कि ऐसी परिस्थिति और ऐसे माहौल में पैदा होकर भी आदमी यहाँ तक पहुँच सकता है। मुझे खुद विश्वास नहीं होता है कि मैं यहाँ तक कैसे पहुँच गया। लेकिन जब में पीछे झाँककर देखता हूँ

और सोचता हूँ कि आज जहाँ पर स्थित हूँ यह मेरे संघर्ष और कबीर साहब के प्रति अटूट विश्वास का ही परिणाम है। समय बित जाता है और सफलता हासिल हो जाती है तो सबकुछ आसान दिखने लगता है लेकिन यह आसान रास्ता होता नहीं है। 

विवेकदास का कबीर को जानना -

जिस पंथ और परम्परा के शीर्षस्थ आसन पर में बैठा हूँ , यह कबीर साहब की कर्मभूमि और साधना स्थली है। इसलिए यहाँ कि पीठ कबीर साहब की मूलगादी कहलाती है। यह पीठ कबीर पंथ का मुख्यालय भी है। गाँव - घर में पहली बार एक कबीरपंथी मण्डली से कबीर साहब का नाम सुना था। इसके पहले कभी भी कबीर साहब का नाम और उनके बारे में कुछ भी नहीं जानता था। इस मंडली से ही विरोध और प्रतिरोध में कबीर साहब के बारे में जानकारी हासिल की। लेकिन इस कबीरपंथी जमात के व्यवहार और कर्म - धर्म मुझे पसंद नहीं थे। फिरभी ,

इन लोगो ने कबीर साहब के प्रति मेरी जिज्ञासा और ललक अवश्य ही पैदा कर दी थी। इसके बावजूद मैंने स्वतंत्र रूप से कबीर साहब के बारे में जानने - समझने की भरपूर कोशिश की। इस मंडली से पहली बार कबीर साहब के एक पद को भजन के रूप में सुना था - 'रहना नहीं देश वीराना है'. इस पद में संसार की नश्वरता का दर्शन है। इस पद को गहराई से जानने और समझने के बाद मन में निवृति - मार्ग का उफान आ गया और मन बैरागी बन गया था। इस वैरागी मन को बयान करना कठिन काम तो है। इस समय में अपने काम और आंदोलन को लेकर आकाश में उड़ रहा था। अचानक इस बदलाव के कारण धड़ाम से जमीन पर आ गिरा। 

विवेकदास जी का बदलना -

साधुता की तरफ मेरे बढ़ते कदम को देखकर लोग आश्चर्य चकित हो रहे थे। एकाएक आदमी में ऐसा और इतना बदलाव प्रकृति का ही करिश्मा हो सकता है। प्रवृत्ति से निवृत्ति मार्ग का द्वन्द मेरे लिए एक बड़ी समस्या थी। लेकिन इस द्वन्द के बिच रास्ता निकालने में सफल हो गया। मेरा मन बचपन से ही जिद्दी है और जिद्द की इस प्रवृत्ति के कारण जिधर झुकता हूँ तो उधर का ही रास्ता बन जाता है। में बचपन से ही सत्य मार्ग का खोजी रहा हूँ।

कबीर साहब का मार्ग सत्य का है। यह तो समझ में आ ही गया था। इसलिए मन यहाँ आकर पूर्णतः ठहर गया। में सत्य की पक्षधरता को अपने जीवन और कर्म में अब तक धारण करते हुए आगे बढ़ता रहा हूँ। यहाँ आकर मेने मूलगादीमठ में साधुता की दीक्षा ली। क्योंकि मूलगादीमठ कबीर साहब की कर्मभूमि है और इसी कर्मभूमि से कबीर साहब ने मध्यकाल में भक्ति - आंदोलन चलाया था और पुरे देश में सत्य - मार्ग और भक्ति - मार्ग की स्थापना की थी। हमने बहुत ऊंचाई से कबीर साहब की महिमा और उनके व्यक्तित्व को समझा था लेकिन जब कबीरचौरामठ मूलगादी की दिशा और दशा को देखा तो अपार दुःख हुआ। दीक्षा लेने के बाद मठ की दिशा दिशा और दशा सुधारने की ठानी और धीरे - धीरे मठ में पकड़ बनाने की कोशिश की। मठ तथा कबीर साहब को दुनियाभर में महिमामंडित करने के लिए संकल्प लिया। आज अपने संकल्प को पूरा होते देखकर मेरा मन प्रसन्नता से भर उठा। 

मन के हारे हार है मन के जीते जीत -

कबीर साहब की एक महत्वपूर्ण साखी है - 'मन के हारे हार है , मन के जीते जीत' इस साखी से मेरा मन बहुत मजबूत और ताकतवर हुआ है। ऐसा ही हर आदमी अपने मन में ठान ले तो जो चाहे वह कर सकता है। इसका उदाहरण मेरे सामने मौजूद है मेरे ही रूप में। इसलिए मेने अपने जीवन और जन्म से इस पुस्तक की शुरुआत की है ताकि तमाम लोगो को इससे प्रेरणा मिल सके। संघर्ष और संकल्प से आदमी अपनी मंजिल तक पहुँच सकता है। मेने अपने संघर्ष और संकल्प से कबीर और कबीरपंथ कि डूबती नैया को न सिर्फ किनारे लगाने मैं सफलता हासिल की। बल्कि इस पर ऐसी मजबूत पतवार बाँधी कि तेज भँवर में भी इसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। मैं जब यहाँ आया तो कबीर साहब के नाम पर अनेक पंथ - उपपंथ बन गए थे। आज भी है। इस पंथ और उपपंथो के बिच में कबीर साहब के सच का रास्ता क्या है ? मैंने कबीरपंथ से भ्रम का पर्दा हटाने की ठान ली। 

पहला अंतरराष्ट्रीय कबीर महोत्सव -

सन 1998 में कबीर साहब के छह सौ वर्ष पुरे होने वाले थे। छह सौवी जन्मशती वर्ष में मुझे एक सुनहरा अवसर दिखा और इस वर्ष के पूर्व से ही मैंने देश और दुनिया में इसके लिए व्यापक वातावरण तैयार किया। सन 1998 वर्ष आते - आते छहसौवी प्राकट्य महोत्सव की धूम मच गयी। इस महोत्सव के निमित्त नयी दिल्ली ,

मदनगीर में अनोखा और अनूठा तथा अपनी तरह का अकेला अंतरराष्ट्रीय कबीर भवन का निर्माण हो सका। ये दोनों कार्य कबीर और कबीरपंथ के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण था। इस समय इन कार्यो को लेकर मैं सर्वाधिक व्यस्त था। इसी अवसर पर मूलगादीमठ पर मेरे लिए ताजपोशी का प्रस्ताव आने लगा। 

मूलगादीमठ पर ताजपोशी -

और मूलगादीमठ पर मेरी ताजपोशी हुई सन 1999 में कबीर प्राकट्य महोत्सव पर हजारो भक्तो , संतो और महन्तो के बीच। इस ताजपोशी समारोह में ही मैंने पंथ के विकास और विस्तार की अधिकार पूर्ण ढंग से यह घोषणा की।  इस घोषणा में मूलगादीमठ के विकास के साथ -

साथ पंथ के भीतर और बाहरी फैली विकृतियों और कुरीतियों को भी नेस्तनाबूद करने का संकल्प भी दोहराया था। कबीरचौरामठ मूलगादी की पाँच परियोजनाएं और कबीर के कातिल जैसी पुस्तक मैरी सार्वजनिक वचनबध्दता की देन है ; जो पाठको के सामने प्रस्तुत है। 

संत विवेकदास आचार्य 

साहेब बंदगी 

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