कबीर के कातिल : कौन और कैसे ? kabir ke katil : kon or kese ?
कबीर और कबीरपंथ -
कबीर और कबीरपंथ तथा कबीर की परम्परा पर मैने जब अध्ययन - विश्लेषण की शुरुआत की थी तब मुझे यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ था कि कबीर साहब का इतना महान व्यक्तित्व और कृतित्व है , इसके बावजूद , पंथ और पंथ की परम्परा में इतनी पौराणिकता इतना कर्मकाण्ड तथा दुनिया भर का पाखण्ड कैसे और कहा से प्रवेश कर गया है।
कबीर साहेब का व्यक्तित्व -
यदि हम सिर्फ संत नाभादास के भक्तमाल की छह पंक्तियों के छप्पय को ही सामने रखकर कबीर साहेब के व्यक्तित्व, कृतित्व तथा उनकी साधना की परम्परा का मूल्यांकन करे तो कबीर साहेब के ऊपर हजार पन्ने लिखने की कोई जरुरत नहीं होगी। इन छह पंक्तियों के छप्पय से ही कबीर साहेब का सम्पूर्ण व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी साधना के सारे पक्ष सामने आ जायेंगे।
कबीरचौरामठ मूलगादी -
जब में कबीरचौरामठ मूलगादी में साधुता की दीक्षा लेने आया तो सत्य और विश्वासपूर्वक यह जाना कि कबीरचौरामठ मूलगादी ही कबीर साहब की कर्मभूमि और साधनास्थली है। इसी एक परिसर में उनका पालन-पोषण भी हुआ है। इसीलिए यह मूलगादीमठ कबीरपंथ का मुख्यालय है और कबीर साहब की मूलगादी कहलाता है। कबीरपंथ की इतनी समृद्ध और ऐतिहासिक विरासत होते हुए भी कबीर साहेब के नाम पर पाखंड और पौराणिकता का भयानक प्रकोप कैसे और कहा से प्रवेश कर गया यह सोचने वाली बात है। यह पौराणिकता अब तो कबीरपंथ में कुष्ठ बीमारी की तरह फैल चुकी है ; जो लगता है कभी ठीक नहीं होने वाली है।
मूलगादी कबीर साहब की परम्परा और उनकी विरासत का मुख्य हक़दार है। इसलिए हमारी नैतिक और वैचारिक जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे अपराध करने वालो के खिलाफ रणयुद्ध की तरह मैदान में उतर आवे ताकि आगे किसी की हिम्मत ना होवे।
कबीरचौरामठ मूलगादी इतिहास -
हमने जब इस संबंध में मठ के इतिहास और परम्परा को खंगाला तो पता चला कि ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रथम गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स सन 1781 में मूलगादी के ठीक सामने ही तत्कालीन माधोदास की बगीची में डेरा जमाये बैठी थी। वारेन हेस्टिंग्स की सेना काशी नरेश राजा चेतसिंह को पकड़ना चाहती थी। राजा चेतसिंह की माता पन्नारानी मूलगादीमठ की परम शिष्या थी। इसी वजह से राजा चेतसिंह को मठ का पूरा संरक्षण प्राप्त था। वैसे भी कबीर साहब के समय से ही काशी नरेश और मूलगादीमठ का गहरा सम्बन्ध रहा है। मठ में तीन तीन प्राचीन कुएँ है जो समय समय पर तत्कालीन काशी नरेशों द्वारा निर्मित है। राजा चेतसिंह के बचाव के लिए तत्कालीन महंत श्री के आव्हान पर काशी की हजारो जनता मठ में जुट गयी थी और ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना पर हमला बोल दिया था। इस जनसमूह ने लाठी, गोजी, ईंट - पत्थरो से मार - मारकर कम्पनी सेना को खदेड़ दिया था। वारेन हेस्टिंग्स को यहाँ से बुरी तरह अपमानित होकर भागना पड़ा। तभी से काशी में यह प्रसिद्ध कहावत बन गयी थी कि - हाथी पर हैादा, घोड़े पर जीन। सिर पर पैर रखकर भागा वारेन हेस्टिंग्स।
यह आजादी की पहली लड़ाई भी मानी जाती है। इस लड़ाई का शिलापट्ट नगर - निगम ने कबीर रोड पर आज-प्रेस के सामने लगा रखा है। इसके बाद राजा चेतसिंह अज्ञातवास को चले गए। तब से लेकर आजादी तक मूलगादीमठ अंग्रेजो की सेना के नजरो में काँटे की तरह चुभता रहा। लेकिन मठ के साधु-संत और महंत कहाँ पीछे हटने वाले थे। जहाँ ऐसी शिक्षा मिल रही हो - सूरा सोइ सराहिये, लड़े दिनन के हेत, सहे घनन की चोट, पुरजा-पुरजा कट मरे, तउ न छाड़े खेत।
यही तो कबीर साहब का आदर्श और उपदेश भी है। आजादी तक मूलगादीमठ लड़ाई की जंग में जूझता रहा सहयोग देता रहा। वारेन हेस्टिंग्स की सेना के साथ पहली लड़ाई से आजादी तक पौने दो सौ वर्ष का समय होता है। इतने समय तक मूलगादीमठ जंगे-आजादी में सक्रीय रहने के चलते अपने धर्म के कामो से वंचित रहा। इसी का फायदा उठाकर पौराणिकतावादी पाखण्डियों और कर्मकाण्डियों ने पंथ के भीतर पैठ बनाई और खूब लुफ्त उठाया।
एक बार जब धर्म के नाम पर उलटी-सीधी परम्परा बन जाती है तो उसे तोड़ने और हटाने में छठी का दूध याद आ जाता है।
जुड़ावन साहू [धरमदास] व जिन्दा कबीर -
इसी संकटकाल में बांधवगढ़ में जुड़ावन साहू नामक एक वणिक पैदा हुए थे। जुड़ावन साहू पहले एक वैष्णव भक्त थे और अपने गुरु के पास मथुरा आया जाया करते थे। जुड़ावन साहू की यही पर कमाल साहब के ज़ालिम और छली शिष्य जिन्दा कबीर से भेंट हुई थी। जिन्दा कबीर एक पाखण्डी सल्तनत का आदमी था। छल - छद्द्म तरिके से ऐतिहासिक कबीर बनकर देशभर में घूमने लगा था। जुड़ावन साहू ने इस छली, छद्मवेशी जिन्दा कबीर को अपना गुरु बनाया। जिन्दा कबीर ने ही जुड़ावन साहू का नाम बदलकर धरमदास रखा और कहा कि जातिसूचक नाम से कबीरपंथ में आप अपनी पैठ नहीं बना सकेंगे। इससे आपको मान यश भी नहीं मिलेगा। जिन्दा कबीर और धरमदास के इस मिलन से कबीरपंथ में भूचाल आ गया और यही से पाखण्ड और कर्मकांडो का कबीरपंथ में संक्रमण होने लगा। दो शातिर एक साथ मिल जाये तो क्या गुल नहीं खिला सकते है।
धरमदास कौन थे -
पुस्तक में इन सब बातो का खुलासा किया गया है कि इन दोनों ने मिलकर कबीर और कबीरपंथ की परम्परा को मटिया-मेट करने की कितनी बड़ी साजिश रची थी। इतिहास और परम्परा को नहीं जानने वाले लोग धरमदास को कबीर साहब का मुख्य शिष्य मानते है लेकिन धरमदास तो कबीर साहब के समकालीन ही नहीं थे। इस पुस्तक में प्रमाण के साथ बताया गया है कि धरमदास की पूरी परम्परा जालिमो और मक्कारो की परम्परा है। धरमदास इस मायने में अकेले नहीं है। इनके साथ सेकड़ो की जमात है। सब के सब जालिम और मक्कार है।
कबीर के कातिल : कौन और कैसे ? kabir ke katil : kon or kese ?
धरमदास की परम्परा -
पेट भी बड़ा जालिम है। पेट के कारण ही सत्य को असत्य में बदल देने में देर नहीं लगती है। पेट से ही जुड़ा मान - सम्मान और यश - अपयश भी है। इसलिए तो कबीर साहब को कहना पड़ा है कि सबै भुलाने पेट के धंधा, एक दुइ होय तो कहि समझाऊ। कबीर साहब अपने ज़माने में ही कह गए थे कि साँच कहु तो मारन धावै, झूट जग पतियाना। धरमदास की परम्परा भी झूठ की नीव पर खड़ी है। झूठ ही झूठ सब व्यवहार है। ऐसा कबीर साहेब ने अपने समय में ही कहा है। झूट माया का प्रपंच है। इसलिए झूट सबको अच्छा लगता है। कबीर साहब ने सत्य को तप कहा है और झूट को पाप। जिस के दिल में सच का प्रवेश हो जायेगा, वह संसार की प्रवत्तियो से दूर हो जायेगा। धरमदास की परम्परा में केवल झूठ का ही पसारा है। मोह-माया आदमी के लिए अंधकार का रास्ता है। और धरमदास की परम्परा में मोह-माया के सिवाय और कुछ भी नहीं है। कबीर साहब का मार्ग निवृत्ति का मार्ग है। इसके बिना जीव का कल्याण नहीं है। कबीर साहब ने कहा भी है - कहे कबीर ताहिं उबरे, जाहि न मोह समाय। कबीर साहब की वाणी पढ़िए और धरमदास की परम्परा को जानिए तो आकाश और पाताल का अंतर पता चल जायेगा। तब लगेगा कि धरमदास क्यों और कैसे कबीर के कातिल है।
कबीर के कातिल - चंडकदास -
कबीर साहेब के कातिलों में एक चंडकदास भी शामिल हो गए है। चंडकदास का जन्म अनादिकाल मानते है। इन्होने पैशाची भाषा में एक भविष्य-पुराण की रचना की है। इनकी सारी बाते भविष्य में घटित होने वाली घटना के रूप में वर्णित है। उन्होंने भविष्य-पुराण पुस्तक में कबीर साहब से जुडी तीन कथाये लिखी है। पहली कथा में कबीर साहब को पूर्णतः ब्राह्मण बनाने की साजिश है। इस कथा के अनुसार कोई एक पंडितजी अपनी कन्या को लेकर स्वामी रामानंदजी के पास आशीर्वाद दिलवाने ले जाते है। कन्या स्वामीजी को नमस्कार करती है और स्वामीजी उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे बैठते है। पंडितजी स्वामीजी से कहते है की महाराज - कन्या तो विधवा है।
स्वामीजी कहते है कि अब तो बात मुंह से निकल गयी है। अब होगा तो ऐसा ही लेकिन कन्या के ऊपर कलंक नहीं लगेगा। लहरतारा स्थित सरोवर के पास स्वामी अष्टानंदजी मेरे शिष्य है और वहाँ तपस्याररत है। उनके पास इसके नवजात शिशु को छोड़ आना। वे सब कुछ संभाल लेंगे। पंडितजी ने स्वामीजी के कथन का अक्षरशः पालन किया। दूसरी कथा में चंडकदासजी ने कबीर साहब को विष्णु भगवान का अंश बताने के लिए कथा का सृजन किया है। इस कथा में कबीर साहब विष्णु भगवान के अवतार है।
तीसरी कथा में गांधीजी को कबीर साहब का अवतार बताया गया है। इसमें लिखा है कि एक समय में देश अंग्रेजो के हाथ में गुलाम हो जायेगा। गांधीजी मोहनदास नाम से एक वणिक कुल में कबीर साहब का अवतार लेकर आएंगे और देश को आजाद करायेंगे। ये तीनो कथाये कबीर साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व के खिलाफ है और उनकी महानता तथा जनमानस में रची-बसी उनकी छवि को मटियामेट करने की साजिश है।
कबीर साहब की परम्परा का मटियामेट -
कबीर साहब भारतीय इतिहास में एक ऐसे संत हुए है कि उनकी वाणी आज भी जन जन में गूंजती है। उनकी वाणी और व्यक्तित्व अनगिनत लोगो को सम्बल और प्रेरणा देती है। कबीर साहब के समकालीन संतो ने भी बड़ी आस्था और विश्वास के साथ उन्हें स्वीकार किया है। और तो और कई संतो ने उनकी राह पर चलकर अपनी परम्परा को गौरवान्वित किया है। कबीर साहब का व्यक्तित्व इतना बड़ा और महान है कि कई संतो ने खुद अपने को कबीर साहब का अवतार भी बताया और कईयों ने परवर्ती समय में भी कबीर साहब का साक्षात् दर्शन मानकर उनसे शिष्य बनने का रिस्ता जोड़ा है। यहाँ तक तो गनीमत है। जो संत उनके सत्य की पक्षधरता पर आधारित होकर अपनी परम्परा और पंथ चला रहे है, वे तो धन्यवाद के पात्र है। ऐसी परम्परा कबीर साहब के ही विचारो को आगे बड़ा रही है। लेकिन कुछ लोग घटिया और निम्न स्तर पर उतरकर उनकी वाणी और जीवनी का निजी स्वार्थ और भोग-विलास के लिए मनमाना प्रयोग कर रहे हे, वे कबीर के कातिलों में शामिल है। ऐसे कई लोग है जिन्होंने गलत तरिके से गलत व्याख्या और गलत परिभाषा प्रस्तुत कर कबीर साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व को धूमिल किया है और कर रहे है। उनके खिलाफ आवाज उठाना आवश्यक है। ऐसे ही लोगो , पाखण्डी संतो और उनकी परम्परा के खिलाफ तथ्यात्मक ढंग से इस पुस्तक में विवेचना की गयी है और बताया गया है कि कहाँ और कैसे कबीरवाणी और उनके व्यक्तित्व का गलत प्रयोग हुआ है। वर्तमान समय में भी अनेक ऐसे लोग है जो कबीर साहब का अवतार बनकर जेल की हवा खा रहे है तो अभी भी कुछ लोग छुट्टे सांड की तरह खुलेआम घूम रहे है तथा कबीर साहब का बाना ओढ़कर धर्मगुरु बने हुए है। पुस्तक में ऐसे ही नकली धर्मगुरुओ और भगवानो की कलई खोली गयी है।
राधा-स्वामी सत्संग, विहंगममार्गी सदाफलदेव, रामपाल, मधु परमहंस आदि और न जाने कितने ऐसे पाखण्डी-कर्मकाण्डी अज्ञानी वंचक लोग है जो कबीर साहब के विचारो और उनकी वाणी की परिभाषा तथा व्याख्या गलत तरीके से बदल-बदलकर अपनी परम्परा चला रहे है और कबीर साहब को भी छूमंतर वाले बाबा घोषित कर रहे है। ये सब के सब कबीर के कातिल है।
कबीर साहब और उनके शिष्य -
कबीर साहब के अनेक शिष्य समकालीन थे। उनके परिनिर्वाण के बाद ये सभी शिष्य अलग-अलग क्षेत्रो में जाकर कबीर वाणी का प्रचार-प्रसार करने लगे थे। कबीर साहब के नाम पर जगह-जगह आश्रम और मठ बनने लगे। 'बीजक' कबीर साहब का मूल ग्रन्थ है। ये लोग हाथ से लिख - लिखकर इसकी प्रतिया बनाते थे। इसलिए पंथ और मठो में विपुल मात्रा में बीजक की पांडुलिपियां मिलती है। मूलगादीमठ में अनेक पांडुलिपियाँ मिलती है। मूलगादीमठ में अनेक पांडुलिपियाँ संग्रहालय और पुस्तकालय में सुरक्षित है। कबीर साहब की शिष्य परम्परा में बीजक पढ़ने और पाठ-पूजा करने की परम्परा रही है। बीजक के दर्शन पर ही ये लोग चलते थे। इसलिए कि बीजक कबीरपंथ का धार्मिक ग्रंथ है। बीजक कबीरपंथ में सर्वमान्य पूजित ग्रंथ है।
सौ-पचास बरस के बाद मूलगादीमठ की इन शाखाओ मठ के लोगो के बिच बीजक को लेकर विवाद छिड़ गया। ये अलग-अलग और अपना-अपना बीजक पाठ बनाने में लग गए। किसी ने रमैनी बदली तो किसी ने शब्द में हेर-फेर कर लिया। किसी ने बीजक की शुरुआत साखी से की तो किसी ने रमैनी प्रकरण को आगे-पीछे कर दिया। बीजक को लेकर पंथ में घमासान मच गया। इसी घमासान के चलते पंथ में कई बीजक-पाठ संस्करण बन गये। जिस परम्परा के मठ वालो ने ऐसा दुष्कर्म किया , आज वे भुगत रहे है। इन लोगो की परम्परा का मठ प्रायः भुतखाना बन गया है। कबीर साहब ने निश्चित रूप से इन लोगो पर अपना कहर बरसाया है। यह कहर इन मठो में साक्षात दीखता है। देखने और समझने की आँख चाहिए। 'बीजक' अन्धो की रेवड़ी बन गया।
हिंदी साहित्य में कबीर साहब -
हिंदी साहित्य में कबीर साहब पर लेखन-अध्ययन और अनुशीलन से बोद्धिकजनों में कबीर साहब के विचारो का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है लेकिन हिंदी-साहित्य के क्षेत्र में भी अखाडाबाजो की कमी नहीं है। इन साहित्यकारों की अखाड़ेबाजी और पूर्वाग्रह से ग्रसित व्याख्या के कारण ही कबीर साहब के कई पक्षों के स्वरूप बदल गए है। इसलिए हिंदी-साहित्य के शीर्षस्थ लोग भी कबीरवाणी को लेकर भृम के शिकार है। कबीर साहब ने अनेक वाणियो को रूपको, प्रतीकों में व्यक्त किया है। ऐसे भी उनकी एक वाणीयों के कई अर्थ होते है। लौकिक, व्यावहारिक और आध्यात्मिक द्रष्टि से ऐसी सखियो के अर्थ लिए गुरु - परम्परा का भी सहारा लेना पड़ता है। एक साखी के तीन अर्थो में प्रयोग होने को लेकर अपने विवेक का भी इस्तेमाल करना पड़ता है। समय परिस्थितिजन्य कथन की बातो की गहराई में जाना आवश्यक है।
कबीर की साखियाँ -
हम यहाँ पर एक दो साखियो का उदाहरण देकर समझाने और बताने का प्रयास करेंगे कि हिंदी-साहित्य के अध्येताओं ने उनकी साखियों के साथ कहाँ और किस प्रकार अनर्गल-प्रलाप किया है। इसी प्रलाप के चलते कबीर और कबीरवाणी के साथ न्याय नहीं हो सका है। डॉ रामकुमार वर्मा हिंदी-साहित्य के मनीषी चिंतक है। उनकी इस भूल और भ्रम पर गौर कीजिये। डॉ वर्मा ने 'गुरुग्रंथ साहिब' से एक पद लिया है - मेरी बहुरिया का धनिया नाउँ, ले राख्यो रमजनिया नाऊँ, एक थी कुरूपा और एक थी स्वरूपा। इसके आधार पर डॉ वर्माजी कबीर की तीन पत्निया साबित करते है। बहुरिया भोजपुरी में पत्नी को कहते है लेकिन यहाँ पर बहुरिया जिव है। धनिया धन-दौलत रुपया-पैसो को कहते है और रमजनिया वेश्या को कहते है। धनिया, धन-दौलत रुपया-पैसा कहते है। जिस तरह वेश्या किसी एक की नहीं होती है , वैसे ही रुपया-पैसा दिनभर में कई हाथो में जाता है इसलिए रुपया पैसा भी रमजनिया है। कुरूपा तृष्णा को कहते है।
कबीर साहब ने तीनो को अपनी संगिनी माना है लेकिन माया और तृष्णा से वे दूर रहते थे। भक्ति को उन्होंने अपने जीवन में धारण किया था। माया , तृष्णा और भक्ति कबीर साहब की तीन पत्निया अवश्य थी लेकिन सांसारिक नहीं आध्यात्मिक। इन तीनो का आध्यात्मिक अर्थ और परिभाषा है। ध्यातव्य है कि कबीर साहब ने अपने पदों और साखियों में अनेक स्थलों पर अपने को स्त्री रूप में वर्णित किया है। लेकिन इन साखियों और पदों के कथन पर उनको स्त्री कोई नहीं कहता है। कबीर साहब की निर्गुण भक्ति परम्परा में परमात्मा के सामने जीव को स्त्री रूप ही माना गया है। 'हम घर आये राजाराम भरतार ' भोजपुरी में भरतार पति को कहते है और दुल्हिन जीव है। परमात्मा जीव का पति है। यहाँ पर जीव और परमात्मा का मिलन है। पटिया में बाँध लूँ भैंसुर परलोगारी। एक दुल्हिन की तरह सास , ननद और भैंसुर की बात करते है। कबीर साहब के इन आध्यात्मिक पदों के साथ अन्यायपूर्ण नासमझ व्याख्या आखिर कब तक ?
हिंदी-साहित्य की परम्परा में कबीर -
हिंदी-साहित्य की परम्परा में कबीर साहब को अनपढ़ कहने का प्रचलन आम है। कबीर साहब को अनपढ़ कहे या लिखे बिना हिंदी वालो की बाते पूरी नहीं होती है। इस पक्ष में हिंदी के लोग कबीर साहब की इस अर्द्धाली को प्रस्तुत करते है कि उन्होंने स्वयं कहा है , 'मसि कागद छुयो नहीं , कलम गह्यो नहीं हाथ ' , लेकिन वे यह क्योँ नहीं जानते है कि कबीर साहब आत्मवादी संत थे। आत्मा अजर है , अमर है , अपार है , अनीह है , रूप रंग से परे है और अकथ्य भी है। उसका वर्णन कागज और कलम से किया जा सकता है , जो लिखने में ही नहीं आता है और गूंगे केरी सरकरा भी है ? आत्मा अनुभूतिजन्य ज्ञान है। इस आध्यात्मिक ज्ञान के लिए लिखने-पढ़ने की जरूरत नहीं है।
दूसरी बात , अपनी एक दो साखियो में कबीर साहब लिखने - पड़ने की बात करते है। ये लोग इन साखियो को उदाहरण के रूप में उनके लिखने - पढ़ने के पक्ष में क्यों नहीं प्रस्तुत करते है ? 'सात समुद्र की मसि करूँ , लेखन सब बनराय , धरती सब कागद करूँ , हरी गुण लिखा न जाय। जिस हरी यानी आत्मा का गुण लिखा नहीं जा सकता है, वहाँ पर कलम , कागद और स्याही की जरूरत कहाँ है। इन साखियो को आध्यात्मिक द्रष्टि से ही समझना ठीक है। एक साखी और भी है जिसमे कबीर साहब राम को पतिया लिख - लिखकर भेजते है। 'यह तन जालौ मसि करू लिखो राम का नाम , लेखन करूँ करंक का लिखी लिखी राम पठाऊँ। ' कबीर साहब ने ॐकार से लेकर ककहरा तक के अक्षरों पर अध्यात्म की अपनी बड़ी - बड़ी कविताओं की रचना की है। ऐसे संत को आप अनपढ़ कहते है। कबीर साहब तो बौद्धिकता की पराकाष्ठा वाले संत थे। हम कहते है कि आप अपने पूर्वाग्रह से बाहर निकल कर देखिये तो निश्चित रूप से जरूर कुछ समझ में आएगा। हिंदी साहित्य के विद्वानों की इन तीन बातो को कहे बिना उनकी बाते पूरी नहीं होती है। कबीर विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे , कबीर गृहस्थ थे और कबीर अनपढ़ थे। हालाँकि इन तीनो बातो से कबीरपंथी सख्त नाराज होते है। ये तीनो पक्ष किंवदंतियों के कारण ही प्रचलित है। लेकिन हिंदी - साहित्य में यह अब इतिहास बन गया है।
कबीर के कातिल -
दुःख की ये भी बात है कि कबीर के कातिल अपने घर के भी तीन लोग है। ये तीनो लोग मठ के ही अन्न - पानी से पले - बढ़े है लेकिन अब मठ के साथ गद्दारी कर रहे है। विकास की तरफ बढ़ते मठ के कदम को रोकने का भरपूर प्रयास कर रहे है। इन तीनो के व्यवधान से मेरे काम में रूकावट और समय की बर्बादी बहुत ज्यादा हुई है। बाहर के शत्रुओ से तो हम लड़ते ही रहे है , घर के दुश्मनो से लड़ने से बहुत ज्यादा नुकसान होता है। कबीर साहब ने स्वयं कहा है कि 'घर का भेदी लंका ढाये ' .
घर का दुश्मन पल - पल की खबर रखता है। घर के भेदी के कारण रावण का लंका का राज्य - साम्राज्य समाप्त हो गये। सवा लाख नाती - पोता सब नष्ट हो गए। यह एक उदाहरण है। दुनिया में ऐसे सेकड़ो उदाहरण मौजूद है। घर की आपसी लड़ाई में राज्य के राज्य समाप्त हो गये है।
गंगाशरणदास , विचारदास , नवीनदास -
ये तीनो कातिल है - पूर्व महंत गंगाशरणदास , मगहरमठ के प्रबंधक संत विचारदास , और पटना सिकंदरपुर कबीरमठ के प्रबंधक नवीनदास। इन तीनो को भी कबीर के कातिलों में शामिल किया गया है और इस किताब में बताया गया है कि मठ की सम्पत्तियो को किस प्रकार निजी उपयोग के लिए ये लड़ाई लड़े थे और अभी भी लड़ रहे है। कबीर साहब निश्चित ही इन लोगो को दंडित करेंगे और अगले जन्म में प्रकृति ऐसा दंड देगी कि ये पृथ्वी पर आकर भी एक - एक कण के लिए तरसते रहेंगे। इन लोगो का यदि कबीर साहब की इन पंक्तियों की तरफ थोड़ा भी ध्यान गया होता तो ये लोग मठ के साथ ऐसी गद्दारी और मक्कारी नहीं करते , 'जगत में खाली हाथ आया है और खाली हाथ ही जायेगा। मुट्ठी बाँधकर आया रे बंदे हाथ पसारे जायेगा। इस जगत में कुछ नेकी कर ले यही एक साथ में जायेगा। एक पुष्पक विमान पर चढ़कर जाता है और एक को जंजीर से बाँधकर यमराज धर्मराज के यहाँ पहुँचाया जाता है। हे मेरे प्यारे भाइयो कबीरपंथी हो तो कबीर साहब के आध्यात्म को जानो और उसपर चलना सीखो और उसे अपने जीवन तथा व्यवहार में उतारो। कुछ भी साथ नहीं जाने वाला है। सब कुक यही पर धरा रह जायेगा।
संत श्री विवेकदास जी साहेब
साहेब बंदगी

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