मूलगादीमठ का संकटकाल -
1766 में बलवंत सिंह की मृत्यु हो गयी । बलवंत सिंह के देहान्त के बाद राजा चेतसिंह सिंहासन पर विराजमान हुए । राजा चेतसिंह को राजसिंहासन पर आरुढ़ होने में बहुत सारी परेशानियाँ थीं । क्योंकि चेतसिंह पन्नारानी के पुत्र थे और पन्नारानी को बलवंत सिंह की रखेल कहते थे । इतिहास के उलझनों से हमें कोई सरोकार नहीं है ।
राजा चेतसिंह को राजसिंहासन पर आरुढ़ करने में मूलगादीमठ की भूमिका महत्वपूर्ण रही है । तब बलवंत सिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार के बीच उल्टे - सीधे अनुबंध हो चुके थे । टैक्स को लेकर और रुपये - पैसों को लेकर कम्पनी सरकार और चेतसिंह के बीच उठा - पटक होती रहती थी । चेतसिंह शिवाला के बजाय मूलगादीमठ में ज्यादातर रहने लगे थे ।
इस दौरान कम्पनी सरकार का तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स 14 अगस्त 1781 में बनारस आया था और मूलगादीमठ के सामने तत्कालीन माधोदास की बगीची में डेरा जमाया था । आज इस जगह पर राधास्वामी अस्पताल है । वारेन हेस्टिंग्स के मठ के सामने डेरा डालने का कोई ना मतलब रहा होगा । मतलब जो भी हो उस समय चेतसिंह मूलगादीमठ में थे । चेतसिंह वारेन हेस्टिंग्स से लेन - देन के मामले को लेकर परेशान थे । वारेन हेस्टिंग्स कम्पनी सेना लेकर माधोदास की बगीची में डेरा जमाये हुए था । चेतसिंह के अनुरोध पर तत्कालीन महन्तजी ने काशी की जनता का आह्वान किया और काशी की हजारों जनता मूलगादीमठ में जमा हो गयी । जब यह बात हेस्टिंग्स को मालूम पड़ी तो यहाँ से भागने के लिए रास्ता तलाशने लगा । तब तक जनता की भीड़ ने वारेन की सेना पर हमला बोल दिया । लाठी , डंडा , गोजी और यहाँ तक कि जिसको जो समान मिला उसी से कम्पनी की सेना पर हमला कर दिया । कहते हैं कि कम्पनी की सेना इस कदर भागी कि बनारस में यह कहावत प्रचलित हो गयी — हाथी पर हौदा , घोड़े पर जीन । सिर पर पैर रख भागा वारेन हेस्टिंग्स । स्वाधीनता - संग्राम की यह पहली लड़ाई थी जो कम्पनी सरकार हारकर यहाँ से भागी थी । यह 15 अगस्त 1781 की बात है ।
आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गाँधी , पंडित नेहरू , डॉ . राजेन्द्र प्रसाद , शेख अब्दुल्ला आदि तमाम राष्ट्रीय नेता मठ में पधारते ही रहे । पंडित नेहरूजी तो प्रधानमंत्री बनने पर श्रीमती कमला नेहरू के साथ रामविलास साहब से मिलने आये थे और मठ के विकास की योजना माँग रहे थे । तत्कालीन महंतजी ने राष्ट्रभक्ति की बात कहते हुए सरकारी अनुदान लेने से इन्कार कर दिया था । जबकि देश के लिए हम लड़े थे ।
मैं जब शुरुआत में मठ में आया तो उस समय मठ को लेकर बहुत अच्छे विचार नहीं थे मन में । मुझे लगता था कि यहाँ भी कबीर के नाम पर स्वार्थ का खेल होता होगा लेकिन जब मठ का इतिहास और परम्परा को खंगाला तो लगा कि यह मठ तो कबीर साहब की परम्परा का गौरवशाली स्तंभ है । कबीर साहब का इतना बड़ा और व्यापक आन्दोलन सतरहवीं शताब्दी आते - आते कम्पनी सरकार के कारण एकदम ठप्प - सा हो गया था । यहाँ के साधु - महन्तों को बाहर जाने का अवसर नहीं मिलता था । मठ के साधु - महन्तों पर कंपनी सरकार की कड़ी नजर रहती थी । यहाँ छिप छिप कर आजादी के दीवानों को तैयार किया जाता था । मठ के इक्कीसवें महन्त आचार्य रामविलास ने मठ की लड़ाई और मठ की परम्परा के बारे में जो कुछ भी बताया है वह मेरे लिए मठ के इतिहास का सुनहरा पन्ना है ।
कबीर साहब का भक्ति आन्दोलन -
मध्यकाल में कबीर साहब ने देशव्यापी भक्ति - आन्दोलन चलाया था । इस भक्ति आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में फैल चुका था । गुलामी के दौर में मूलगादीमठ से साधु - सन्त और महन्तों को धर्म प्रचार के लिए बाहर जाने का अवसर नहीं मिल पा रहा था । दूसरी तरफ कबीर और कबीरमठ मूलगादी के विरोधियों की एक लम्बी जमात खड़ी हो गयी थी । कम्पनी सरकार भी मलगादी के विरोधियों को तलाश -
कबीर साहब ने भक्ति आन्दोलन के प्रभाव से जिस तरह जन - जन में अपना प्रभाव जमाया था । उनके नाम पर जगह - जगह छोटे - बड़े आश्रम और मठ बने हुए थे । इन आश्रमों और मठों में कबीरवाणी की परिभाषा और व्याख्या ही बदलने लगी थी । क्योंकि इनलोगों पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं रह गया था । अनेक लोगों के द्वारा पंथ और उपपंथ बनाकर कबीर साहब के नाम पर अपनी रोटी सेकी जाने लगी थी । ऐसे लोग नाम तो कबीर साहब का ही लेते थे लेकिन काम अपने मतलब और का करते थे ।
कबीरपंथ का मटियामेट -
इसी सत्रहवीं सदी में जब मठ अंग्रेजों के चंगुल में फंसा हुआ था तो इनलोगों को मौका मिला । कबीर साहब के नाम पर जमकर नयी - नयी धर्म की दुकानें बनीं । ये लोग बताते रहे कि यही कबीर साहब का रास्ता और उनका मार्ग है । कबीर साहब की महिमा और प्रतिष्ठा को जमकर इन पातकी लोगों ने भुनाया । ज्यादातर कबीरपंथ की शाखाएँ और उपशाखाएँ इसी काल की निर्मित हैं । में इन्हीं कातिल पातकियों के बारे में विस्तार से चर्चा की गयी है ।
संत विवेकदास आचार्य
साहेब बंदगी

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