टेक- मैं सोऊं सतगुरु थारे मांही
सतगुरु है मुझ मांही ।
निद्रा न आये नेड़ी काम न छूटे
क्रोध सकल भव नाही ॥ टेर ॥
1- धरणि गिगन बीच कबयून सोऊं
देवूं मुरसव वाली फेरी ।
नाम द्वादश शुद्ध समाऊं
उलट बंक दिश घेरी ॥ १ ॥
मैं सोऊं सतगुरु थारे मांही
सतगुरु है मुझ मांही ।
2- दस दरवाजा बंद कर सॉऊं
घुलक मुलक तक नाहीं ।
पाचों चोर पगा तले देऊ
तीन गुणा की गम नांही ॥२ ॥
मैं सोऊं सतगुरु थारे मांही
सतगुरु है मुझ मांही ।
3- मेरु दंड का मारग सीधा
सोहंग बनक थर्राई ।
भवचर वचन नभ डोरी लागी
सहज इक्कीसों पाई ॥ ३ ॥
मैं सोऊं सतगुरु थारे मांही
सतगुरु है मुझ मांही ।
4- सोयां पीछे कभी नहीं जागू
लुट जाओ लंका भलाई ।
इन्दर पुरी स्वर्ग लुट जाओ
धरन गिगन डिग जाई ॥४ ॥
5- वचन गहे जो साधू के तो
जनम मरण मिट जाई ।
कहे कबीर किसी का गम नहीं
मेरी गम मुझ माई ॥ ५ ॥
मैं सोऊं सतगुरु थारे मांही
सतगुरु है मुझ मांही ।
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