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सम्भल कर पांव धर आगे / sambhal kar panv dhar aage

दोहा- संभल संभल कर चल आगे

गगन घाट झीना है

आत्माराम कहे सुन भाई साधो 

निज वस्तु को पाना है ।


टेक- सम्भल कर पांव धर आगे

कभी तेरा पांव फिसलेना ।


1- त्रिकुटी बीच मे जाना

त्रिवेणी गंग में नहाना

अम्रत पीके अजर अमर होना

आगे चढ़ शिखर गढ़ लेना ।


2- गगन में गेबी खेले खेल

बड़ा वहां कुदरत का है मेल

गगन बीच गेबी गोला झेल

मिले कोई गुरु प्रवीना ।


3- गेब वहाँ देख बिन तोले

उठे आवाज बिन बोले

वो परदा उठे बिन खोले

दर्श खुद बी खुद कर लेना ।


4- गुरु प्रेमिचन्द वक्ता है

आत्माराम अनुभव लखता है

बिन गुरु जा नही सकता है

वो अनमोल वस्तु पा लेना ।


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