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सुन ले रे प्राणी रे / sunle re prani re

सुन ले रे प्राणी रे


साखी 


1- श्वास सुफल जो जानिए , जो सुमिरण में जाय

और श्वास यूँ ही गये , कर - कर बहुत उपाय।।


2- क्या भरोसा देह का , बिनस जाय छिन माय ।

स्वाँस – स्वाँस सुमिरण करो , और जतन कछु नाय।।


भजन


टेक- सुन ले रे प्राणी रे , तेरे साथ न जाये कोय॥


1- कंचन काया की ये नगरी , पुण्य उदय से पाई , प्राणी रे

श्वास का पंछी जब उड़ि जाये , पछताये क्या होय ॥

सुन ले रे प्राणी रे , तेरे साथ न जाये कोय॥


2- मेहनत करके बाग लगाया फिर भी फल ना पाया प्राणीरे 

बीज जहाँ सूलों के बोये , फल कहाँ से होय ॥

सुन ले रे प्राणी रे , तेरे साथ न जाये कोय॥


3- भाई बंधु कुटुम्भ कबीला , जीते - जीते के साथी , प्राणीरे

इस भंवर पर भव के साथी , पाप पुण्य ही होय ॥

सुन ले रे प्राणी रे , तेरे साथ न जाये कोय॥


4- आत्म निर्मल हो जाये कछु ऐसी करनी कर ले रे प्राणी रे

कहते छगन ( गुरू ) प्रभु की भक्ति से , मुक्ति मिलेगी तोय ॥

सुन ले रे प्राणी रे , तेरे साथ न जाये कोय॥


संक्षिप्त भावार्थ - इस भजन में एक खोजी जिज्ञासु कहते हैं - प्राणी इस काया से स्वासरूपी पंछी निकल जाएगा तब सब यही धरा रह जाएगा । तेरे पुण्य कर्मों का प्रतिफल ही है कि मानव जीवन मिला । हम ऐसी करनी कर लें कि हमारे जीवन में आत्म निर्मलता आजाए । किसी के रास्ते पर ( सुल ) काँटे ना बिखेरे , यही प्रभु की भक्ति है ।


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