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चुनरिया पीव ने संवारी / chunariya pic ne savari

 ' चुनरिया पीव ने संवारी ' 


रेखता 


1- करम और भरम संसार सब करते है

पीव की परख कोई संत जाने ।

सूरत और नूरत मन पवन को साथ ले

गंगा और जमुना के घाट आने ।

पाँच को नाथकर ( मारकर ) साथ सोहंग लिया

अधर दरिया का सुख माने ।

कहै कबीर सोई संत निर्भय भया

जो जनम मरण का मर्म जाने।।


2- गंगा जमना के घाट को खोजिले

भंवर गुंजार तहं करत भाई

सुष्मना नीर तहं देखु निर्मल भये

तासु के नीर पीये प्यास जाई ।

पाँच की प्यास तहं देखी पूरी भई 

तीन की ताप तहाँ लागे नहीं 

कहै कबीर यह अगम का खेल है

गैब का चांदना देख माही।। 


भजन

टेक- चुनरिया पीव ने संवारी॥


1- पाँच तार की बनी रे चुनरिया पंचरंग पचीसा प्यारी ।

पंचरंग पचीया प्यारी चुनरिया पीव ने संवारी ।।


2- चाँद सूरज जामें आँचलन लागे जगमग जोति उजियारी

जगमग जोत उजियारी , चुनरिया पीव ने संवारी ॥


3- तीन तार से वा बनी रे चुनरिया , दास कबीर बलिहारी

दास कबीर बलिहारी , चुनरिया पीव ने संवारी ॥


संक्षिप्त भावार्थ- इस पद में कबीर साहब कहते हैं कि इस पांच तत्व और तीन की चुनेरी को पीव परमात्मा ने सवारी है , जिसमें जगमय - जगमग ज्योति स्वरूपी उजियारा हर घर में मौजूद है अतः ऐसे घर की ही बलिहारी है ।


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