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माया संग ना चले / maya sang na chale bhajan

साखी 

1 -सतयुग त्रेता द्वापुर, यह कलियुग अनुमान। 

 सार शब्द एक साँच है, और झूठ सब ज्ञान ॥


भजन 


चेत रे गुमानी फिर ये जन्म ना मिलेगा ।

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥ टेक ॥ 


दस से सोलह गये खेल में , बीस गये माया कि गेल  में । 

चालीस साल तिरिया की सेज पे , पचपन नाड़ी हिलेगा ॥1 ॥

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥

चेत रे गुमानी फिर ये जन्म ना मिलेगा ।

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥


काली गई सफेदी आई, तन की खाल उखड़ सब जाई। 

बंदर जैसा मुँह हो जाये, डगमग नाड हिलेरे ॥2 ॥

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥

चेत रे गुमानी फिर ये जन्म ना मिलेगा ।

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥


तू केहता है मेरी मेरी, ये माया तेरी ना मेरी ।

धन दौलत थारा यहीं रह जावे, अग्नी के साथ जलेगा ॥3 ॥

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥

चेत रे गुमानी फिर ये जन्म ना मिलेगा ।

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥


भजन करेगा तो सुख पावेगा, धन दौलत थारी काम नी आवेगा ।

धन दौलत थारी यहीं रेह जावे, केहत कबीर विचारी ॥४ ॥

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥

चेत रे गुमानी फिर ये जन्म ना मिलेगा ।

माया संग ना चले, काया संग ना चले ॥


शब्दार्थ - हरि सुख = आत्मसुख , संतोषसुख । 

भावार्थ - हे माया के अभिमानी ! आज सावधान हो जा । यदि चूक गया , तो ऐसा उत्तम जन्म संसार में शीघ्र मिलना कठिन है ; और जिसमें तू भूला है वह माया तेरे साथ चलने वाली नहीं है । तेरी आयु के दस से सोलहवें वर्ष तक तो खेल में गये । बीसवें तक मित्रों से मन मिलाने एवं भावुकता में गये । चालीसवें वर्ष तक स्त्री - मोह के चक्कर में गये। फिर पचपनवें वर्ष तक तो सब तरफ से असंतोष के जाल में उलझकर पश्चाताप में हाथ मलने लगा ।

आज भी मोह को छोड़कर जग जा । तू कब तक पड़ा - पड़ा सोता रहेगा । असावधानी में पड़े सोने से तेरा कल्याण नहीं होगा । मोह - माया की भ्रांति का बोझा तू कहां तक ढोयेगा ? मौत तो किसी के टालने से टलने वाली नहीं है । अपने आपको माया मोह से अलग कर लेना भजन है । इसी से संतोष - सुख मिलेगा । धन - दौलत तो अंतत : साथ चलने वाली नहीं है । याद रखो , तुम्हारी अपनी मानी हुई काया भी तुम्हारे साथ नहीं चलेगी । वह तो अंतत : आग में जला दी जायेगी , या मिट्टी में गाड दी जायेगी ।

हे मनुष्य ! मन का मोह त्यागकर अपने अविनाशी आत्माराम का स्मरण कर और  मन के संकल्पों का द्रष्टा बनकर स्व समाधि में डूब । इसमें तेरी कोई हानि नहीं होगी । 

कबीर साहेब कहते हैं कि हे भोले ! अच्छे कर्म कर ले , पर - सेवा कर ले , यही तेरे लिए शंबल है ।

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