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कबीर और तुलसी / kabir or tulsi


कबीर और तुलसी की वास्तविकताएं 

संत विचारदास 

संत कबीर का व्यक्तित्व -

कुछ महापुरुष ऐसे भी हुए हैं और होते हैं , जिनकी उपयोगिता तथा उपादेयता भूत , भविष्य और वर्तमान तीनो काल मे प्रेरणा दायक होती है । उन्हीं महापुरुषों में सद्गुरु कबीर हैं , जो सर्वाङ्गीण , सर्वयुगीन तथा परमोपयोगी हैं । आज के संदर्भ में उनके विचारों की उपादेयता एवं उपयोगिकता बढ़ गयी है । वर्तमान काल की भाँति ही सद्गुरु कबीर के काल में भी विषमता व्याप्त थी । जाति की भयंकरता , पंक्तिपावन की भयंकरता , अर्थ की भयंकरता , राजनैतिक भयंकरता , धर्म की भयंकरता , समाज को पंगु बनाए हुए थीं । धनी - गरीब के बीच आकाश पाताल की दूरी बनी थी । ब्राह्मण - अब्राह्मण में गहरी खाई पड़ी थी । धर्म सबके लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं था । राजनीति एवं धर्म विशेष जाति के हाथों में थे । एक दल दूसरे दल को निमूल करने लगा था । एक राजा दूसरे राजा का सफाया करने में जुटा हुआ था । तत्कालीन समाज प्रचण्ड विषमता की ज्वाला में दग्ध हो रहा था , जिसको देखकर सद्गुरु कबीर आन्दोलित हो उठे । उन्होंने अपनी प्रचण्ड एवं प्रखर ज्ञान किरणों से सारी विषमताओं को धर दबोचा ।

सद्गुरु कबीर के शरीर में आपाद - मस्तक चतुर्दिक आँखें थीं , जिससे प्रत्येक दुर्भावना को देखकर उसे जड़ से काटने के लिए उन्होंने तीव्र तलवार का प्रयोग किया । 

संत कबीर के विचार -

उनका कहना था : ' तू कत ब्राह्मण हम कत सूद्र , हमरे लोहू तुम्हरे दूध । 

                            जो तू ब्राह्मण ब्राह्मणि जाया , आन राह होय काहे न आया । 

                            जो तू तुरूक तुरूकनि जाया , पेटे सुन्नत क्यों न कराया । 

इत्यादि पंक्तियाँ ही जाति - पाँति को निर्मूल करने के लिए तीखी तलवार हैं । जो धर्मरूपी भूत - सिर पर सवार था उसको उन्होंने वाणीरूपी मन्त्र से दूर भगाया । 

वे कहते हैं : ' वही महादेव वही मुहम्मद ब्रह्मा आदम कहिये । 

                   को हिन्दू को तुरूक कहावै , एक जमीं पर रहिये ' । 

उनकी दृष्टि में महादेव ही मुहम्मद , ब्रह्मा ही आदम , पाण्डेय ही मुल्ला , एव पूजा ही निमाज है तथा एकादशीव्रत ही रोजा , सत्यानारायण की कथा ही महलूद है । ये जितने धार्मिक पुरुष और धार्मिक कृत्य है उनके विचार - आचार एक ही जैसे है । सब एक ही जमीन पर रहते है और सबका खाना - पीना , जागना - सोना जगत का समस्त व्यवहार एक दूसरे में परिलक्षित होता है । इसिलए तुम हिन्दू - मुस्लिम , जैन - बौद्ध आपस में जो संघर्ष कर रहे हो यह व्यावहारिक न होकर अव्यावहारिक एवं पराङमुखी है । इससे तुम न अपने समाज का कल्याण कर सकते हो और न दूसरों का । तुम्हारी लड़ाई केवल स्वार्थपरक है , क्योंकि जिसको तुम भाषान्तर में अल्लाह एवं समस्त संसार का नियामक कहते हो उसी को हिन्दू या अन्य धर्म वाले ईश्वर या दवेदूत कहते हैं । जो संसार का सर्जक एवं संहारक है । भला बताओ वह एक या अनेक ? यदि एक है तो झगड़ा कैसा , क्योंकि दो बन सकते नहीं , यदि को होते तो उनके कार्य भी जुदा - जुदा होते । कोई सिर से चलता , कोई पैर से चलता। स्पर्धा के कारण सबलोग अपना अलग - अलग व्यवहार बनाते हैं ।

संत कबीर के समय में हिन्दू - मुस्लिम और राजा - 

हिन्दू - मुस्लिम की सारी लड़ाइयाँ ' पुजाने - खाने ' के लिए ही हैं । ब्राह्मण लोग दूसरे को तो कसाई या किसी को भी नास्तिक कहते हैं परन्तु वे किस कसाई एवं नास्तिक से कम है , क्योंकि वे भी देवी - देवताओं के सामने बकरों - भैसों की बलि देते हैं । उसी प्रकार मुल्ला साहब भी ' कुराने पाक ' के नाम पर कलमा पढ़कर गाय - भैंस , भेड़ - बकरी , ऊँट आदि जानवरों का कत्लेआम करते हैं तथा एक दूसरे की मान्यताओं को न मानने वाले को ' काफर ' कहते हैं भला इसमें कौन कसाई कौन गैरकसाई , कौन नास्तिक एवं काफर हैं । मैं तो दोनों को एक ही मार्ग पर चलते देख रहा हूँ । हमारी दृष्टि में दोनों न तो सच्चे हैं और न पक्के । इनका सारा संघर्ष केवल गुरुआई के लिए है क्योंकि जहाँ पर उच्चादर्श स्थापित करने के लिए पाण्डेजी अद्वैत - ब्रह्मवाद का आश्रय लेते हैं , वही पर इमाम साहब ' सूफीवाद ' का नारा बुलन्द करते हैं अथवा ' अनलहक ' का नारा देते हैं । जहाँ पर मुल्ला साहब ' बुतपरस्ती ' का विरोध कर एक अल्लाह के सिवा दूसरा पूज्य नहीं मानते , वहीं पर पाण्डे बाबा ' मामेकं शरणं व्रज ' का नारा लगाते हैं । भला इन दोनों में क्या अन्तर है ? कबीर साहब कहते हैं कि दोनों का एक ही मार्ग है : 


संतों राह दुनों हम दीठा । 

हिंदू तुरुक हटा नहिं मानें । स्वाद सबन को मीठा ।। 

हिंदू बरत एकादसि साधे , दूध सिंघारा सेत्ती ।। 

अन्न को त्यागै मन को न हटकैं , पारन करें सगौती । 

तुरुक रोजा निमाज गुजारें , बिसमिल बाँग पुकारें 

इनको विहिस्त कहाँ से होवै , जो साँझै मुरगी मारे ।

हिंदू की दया मेहर तुरुकन की , दोनों घट सों त्यागी । 

ई हलाल वै झटका मारै , आग दुनों घर लागी । 

 हिन्दू तुरुक की एक राह है , सतगुरु सोइ लखाई ।। 

कहहिं कबीर सुनो हो संतो , राम न कहूँ खुदाई  ।।


इसी प्रकार उन्होंने देश के राजाओं को भी फटकारा था । उस समय के राजा लोग हुड़दंग मचाये हुए थे । अपनी मूर्खता के कारण छल - छद्म के द्वारा एक - दूसरे के विनाश पर उतारू थे :


राजा देस बड़ो परंपची , रैयत उजारी ।

इतते उत ऊतते इत रहु , यम की साँट सँवारी । 

घर के खसम बधिक वै राजा , परजा क्या धौं करै विचारा । 

संत कबीर के समय में हिन्दू - मुस्लिम और राजा - 

वे राजा अथवा राजा लोग बड़े प्रपंञ्ची हैं । देश के सिंहासन पर बैठने के लिए रक्त की नदी बहा रहे हैं । एक दूसरे का सिर काट रहे हैं । इन राजाओं की दुर्निति के कारण देश भिखारी हो गया है । एक दूसरे की प्रजा उजाड़ी जा रही है । ये लूटेरे राजे लोग धर्म - कर्म के नाम पर जेहाद की लड़ाई लड़ते हैं । इनमें धर्म तो लेशमात्र भी नहीं है । भला इनसे क्या आशा की जाय कि ये राजे - महाराजे राष्ट्र का क्या कल्याण कर सकते हैं । ये राजे लोग पुरोहितवाद मुल्लावाद के पोषक हैं । मुल्ला और पुरोहित अपनी परिधि से बाहर निकलने नहीं देते । जिसके कारण इन्हें विवेक नहीं हो पाता । कबीर साहब की उपर्युक्त पंक्तियों से जान पड़ता है कि राजतन्त्र देश के लिए हितकारी नहीं है । उनका मत है कि जनता स्वयं विवेक के द्वारा अपने धरा एवं राष्ट्र का शासन करे । क्योंकि एक मस्तिष्क के बजाय सौ मस्तिष्कों की शक्ति अधिक सबल होती है । 

कबीर सहाब की दृष्टि में तत्कालीन राजे यमराज से कम नहीं थे । उनकी व्यवस्था से वे क्षुब्ध दिखाई देते है । जनता को ग्रसित देखकर ही उन्होंने उपर्युक्त पंक्तियों का उच्चारण किया था । उपर्युक्त पंक्तियाँ इतिहास की उस घटना का स्मरण कराती है जब दिल्ली से दौलताबाद तथा दौलताबाद से दिल्ली आने - जाने में प्रजा का बहुत विनाश हुआ था । इतिहास की उक्त घटना कबीर साहब के आस - पास की थी । समय भी बड़ा विचित्र था । विदेशियों का आक्रमण देश पर एक के बाद एक होता रहा । विदेशी दस्यु देश पर शासन कर रहे थे । उनके सामने किसी को बोलने का सहास नहीं था । यदि कोई बोलता था तो उसकी खाल खिंचवा ली जाती थी तथा भूसा भरवा दिया जाता था , या हाथियों से.कुचलवा दिया जाता था । विदेशी दुर्दान्त दस्यु ' मेष - महिष वृत्ति ' के होते थे । उनमें राजनीति एवं कुशल - शासन प्रणाली का अभाव था । वे प्रबल कनक - कामिनी के इच्छुक थे । 

इधर देश के शासक भोग - विलासिता के कारण पतनोन्मुख ही नहीं रसातल में निवास कर चुके थे । विदेशी दुर्दान्तों के सामने न किसी राजनेता को बोलने का साहस था न किसी धर्म नेता को । अद्भुत प्रतिभाशाली , परम पराक्रमी , विशाल व्यक्तित्व वाले , सत्य की प्रतिमूर्ति परमुखापेक्षीपराङमुखी सद्गुरु कबीर ही ऐसे महापुरुष हुए हैं अथवा थे जिन्होंने दानवों के साथ मानवता के लिए घोर संघर्ष किया था । ऐसे महापुरुष की महिमा न जानकर एवं उसके व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन करने की क्षमता न होने कारण कुछ लोग मोह में पड़कर ऐसे लोगो से उनका तुलनात्मक अध्ययन करते हैं । जिसने कभी दुर्भावना के विरोध में एक शब्द भी न कहा हो । यदि कहा भी है तो मुख नहीं खुला है । किसी ओट में अपनी बातें कही और कहलवायी है । ऐसे लोग आज भी समाज में विद्यमान हैं जो दूसरों की ओट लिया करते हैं और समाज के समक्ष न जाकर अपनू मुखड़े को पृष्ठ भाग में किए रहते हैं । ऐसे ही लोगों ने बुराइयों का बीज समाज में बोया है , जिसके चलते मानव जाति आजतक एक स्थान पर नहीं हो पा रही है । अन्य धर्मों में कुछ बातों को छोड़कर अधिक साम्य है । यथा छुआ - छूत छाया - स्पर्श आदि । परन्तु हिन्दू धर्म में जितनी बुराइयों को गिनाया जाय वे कम ही है ।

हिन्दुओं में घर - घर ईश्वर का अवतार होता है और वह ईश्वर भी बड़ा कारसाज होता है । उपर्युक्त कारसाजी के पीछे धर्मगुरुओं का हाथ होता है । 

गोस्वामी तुलसीदास एवं कबीर साहब -

गोस्वामी तुलसीदास - 

कुछ लोग गोस्वामी तुलसीदास एवं कबीर साहब में साम्य दिखाने की चेष्टा करते हैं । परन्तु संसार के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने विद्वान् विचारक होते हुए अपने समय के शासकों के खिलाफ खुली आवाज उठाने का साहस नहीं किया । अपने समक्ष दुर्दान्त शासकों के अत्याचार देखते रहे , पर वह मौनावलोकन ही रहा । बल्कि जिन विषमताओं को कबीर साहब ने तोड़ा था , उन्हीं विषमताओं को गोस्वामीजी ने पुन : समाज में जकड़ दिया ।। इनके समय में मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाये जा रहे थे और रामकृष्ण की जन्म - भूमि को हड़पा जा रहा था । उन्हीं के पुजारी होते गोस्वामीजी एक शब्द भी विरुद्ध में नहीं कहे , बल्कि अपने बचने के लिए एक राजपुत्र को परब्रह्म तक कह डाला । जिससे वर्तमान का राजा समझे कि गोस्वामीजी मुझे भी परब्रह्म की कोटि में ले रहे हैं । भला यह कैसी प्रवंचना है , जहाँ पर माँ बहनों का अपहरण होता हो , अपने देवी - देवताओं का अस्तित्व नष्ट किया जाता हो , अपने धर्म की प्रजा उजाड़ी जाती हो , एक व्यक्तिव की जो हिन्दू धर्म का नेता और भगवद् भक्त कहलाता हो वह बुराइयों के खिलाफ एक भी शब्द भी नहीं बोले । ऐसे व्यक्ति को कबीर के साथ जोड़ने में क्या तूक है ।  

भक्ति काल के कवी संत कबीर - 

कबीर आजन्म बुराइयों की जड़ काटने में संघर्षरत रहे । आज उन्हीं के साथ कैसा अन्याय किया जा रहा है । कबीर समाज की समस्त दुर्भावनाओं को तोड़कर एक करने में जुटे हुए थे । अभूतपूर्व सफलता भी उन्हें मिली थी । उनके समक्ष न जाति था न पाँति थी , न किसी को धर्म का ठेकेदार मानते थे , न धर्माडम्बर को ही देखना चाहते थे । सारी बुराइयों को मिटाकर शुद्ध मानव जाति का निर्माण करना चाहते थे। परिणामस्वरूप भारत की निरीह जनता सद्गुरु कबीर की छत्रछाया में आज भी निवास कर रही है । जिसके लिए राजनैतिक धार्मिक अधिकार पूर्णरूपेण नष्ट कर दिए गये थे , आज वही समाज कबीरपंथ से सम्बन्ध रखता है । इनका सम्बन्ध न जाति - पाँति से है न धर्म की कट्टरता से है । यदि धुणाक्षर न्याय के अनुसार ब्राह्मण भत्रिय आये भी तो इस कबीरपंथ को विकृत करने में आहुति का ही काम हुआ । इनकी महन्ती और पद की लिप्सा ने ही पंथ को आगे नहीं बढ़ने दिया , जहाँ कहीं वे रहे और हैं सदा महन्ती एवं पद के लिए लड़ते रहे , उन्होंने कबीरपंथ के लिए शायद ही कोई कार्य किया हो । सद्गुरु कबीर की दृष्टि में केवल मानवता ही जाति है । 

तुलसीदास के विचार - 

वहीं पर गोस्वामीजी महाराज जैसे मनीषी ने हिन्दू - मुस्लिम एवं समाज की एकता के बजाय हिन्दू - हिन्दू में लड़ाने की कोशिश की । जिसके कारण उनकी वाणियों पर दिनानुदिन सन्देह होता जा रहा है । यहाँ तक कि गोस्वामीजी ने कुछ जातियों को अति पाप स्वरूप बतलाया है । ' आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघ रूप जे ' इसी तरह कुछ जातियों से बात करने पर तथा उनकी छाया पड़ने पर स्नान करने को कहा है :


लोक वेद सब भाँतिहिं नीचा , जासु छाँह छुइ लेइच सींचा । 

स्वपच सवर खस जमन जड़ पाँवर कोल किरात । 

रामु कहत पावन परम होत भुवन विख्यात ।। 


ये बातें बहुत खटकने वाली हैं । गोस्वामीजी ने किसी को अन्त्यज कहकर मनुष्यता का जितना बड़ा तिरस्कार किया उतना शायद ही किसी ने किया हो । यद्यपि इनसे पूर्व भी स्मृतियों एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णाश्रम का उल्लेख हुआ है । इनमें लक्षण भी दिखाए गए हैं । परन्तु गोस्वामीजी ने मानवता पर सीधा प्रहार किया । जहाँ पर कबीर साहब कहते हैं कि हमारे तुम्हारे में कोई भेद नहीं है , वहीं पर गोस्वामीजी एक भ्रष्ट ब्राह्मण को पूजने के लिए इंगित करते हैं और सर्वगुण सम्पन्न शूद्र स्पर्श करना भी पाप मानते हैं । भ्रष्ट ब्राह्मण चाहे शद्र को पीटता हो , गाली देता हो , इसके बावजूद वह पूजनीय है : 


' पूजिअ बिप्र सील गुन हीना । सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ।। 

सापत ताड़प परूष कहंता । बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ।। 


दूसरी बात शिक्षा के बजाय शूद्रों और स्त्रियों को पीटकर सुधारने की बाते भी उनकी वाणियों में विद्यमान हैं । गोस्वामीजी की दृष्टि में शूद्र एवं स्त्री - शिक्षा के द्वारा सुधार नहीं जा सकते हैं । केवल उन्हें पीटकर सुधारा जा सकता है । इतना ही नहीं अतुकान्त दृष्टान्त ढोल का देकर अपनी बात की पुष्टि करते है ! 

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी ।। 

जहाँ पर इतनी बड़ी विषमता की खाई खोद दी गयी है वहीं पर आज के कतिपय धर्मान्ध , जात्यान्ध , कबीर और तुलसी को समन्वय की प्रतिमूर्ति बनाने के लिए तुले हुए है । पूर्वाभिमान के कारण आज भयादोहन इतना बढ़ गया है कि सर्वग्राम के कगार पर जात्याभिमानियों को ला दिया है । अब कबीर की पूंछ पकड़कर तुलसी को कबीर से जोड़ने की जालसाजी हो रही है । जबकि दोनों में कोई मेल नहीं है । एक जातिवाद एवं धर्मवाद का नारा देता है तथा समाज को छिन्न - भिन्न करने का उद्घोष करता है :


जे बरना धम तेलि कुम्हारा । स्वपच किरात कोल कलवारा ।। 

ते बिप्रन सन पाँव पुजावहिं । उभय लोक निज हाथ नसावहिं । 

सूद्र द्विजहिं उपदेसहिं ज्ञाना । मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना ।। 

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन , हम तुम्ह ते कछु घाटि । 

जानइ ब्रह्म से विप्रवर , आँखि देखावहि डांटि ।

सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना , बैठि बरासन कहहिं पुराना । 


गोस्वामी तुलसीदासजी की दृष्टि में सूद्र कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो वह द्विज को उपदेश नहीं दे सकता । यदि ऐसा करता है तो गोस्वामी जी की दृष्टि में दोंनो लोकों से हाथ धो लेता है । शूद्र अधम होने के कारण जप , तप , मख नहीं कर सकता है । यदि द्विज महामूर्ख भी हो तो उसको ज्ञान की आवश्यकता नहीं । क्योंकि वह जनार्दन के समान है । उसी प्रकार से शद्र भी यदि महापंडित है तो शूद्रहिं अर्थात् मूर्ख ही है । आज के परिवेश में यह विचार कितना महत्वपूर्ण है , आज के पाठक स्वयं समझ सकते हैं । 

कबीर के विचारो में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र -

वहीं पर कबीर साहब उद्घोष करते है : सो ब्राह्मण जो ब्रह्म विचारै ।

काबीर साहब की दृष्टि में ब्राह्मणं वहीं है , जो ब्रह्म का विचार करता है । यह कितना बड़ा आशावादी विचार है , जहाँ शूद्र  अशूद्र का कोई भेद नहीं है । सबको विचार की महत्ता प्रदान की गयी है ।

दूसरी ओर निराशा की लहर मनुष्यों को डूबा रही है । उसका एक बहुत बड़ा वर्ग शूद्र कहलाता है । वह पण्डितजी के पाँव तले की धुलि से भी गया गुजरा है । पंडितजी इतने पवित्र हैं कि पाँव भी छुआना बुरा मानते हैं । 

सर्वत्र दो बाद सदैव विद्यमान रहे हैं । एक वादी तथा दूसरा प्रतिवादी । वादी वह है जो अन्याय को लेकर न्यायालय में जाता है । प्रतिवादी वह है जो न्यायिक भावना का प्रतिवाद करता है । अनेक युक्ति प्रमाण तर्कों से सत्य पर कुठाराघात करता है । अधिक से अधिक प्रतिवादी न्यायालय से विमुक्त कर दिए जाते हैं परन्तु जनता जनार्दन के मानस में प्रतिवादी को स्थान नहीं मिलता । अन्ततोगत्वा प्रतिवादी जन - न्यायालय में पराजित होकर सदा - सर्वदा के लिए समाप्त हो जाता है । चिकनी चुपड़ी बातें समाज में रूचिकर तो होती हैं पर कल्याणकारी नहीं ।  

सद्गुरु कबीर ने अनेक प्रकार की विषमताओं को लेकर अपने वाद को प्रस्तुत किया था तथा मानवता की लड़ाई उन्होंने जीवन पर्यन्त जारी रखी थी । विषमता की लहर में डूबती हुई मानवता का उद्धार किया था । सभी वस्तुओं पर सबका अधिकार दिलवाया था । उनकी दृष्टि में ब्राह्मण - अब्राह्मण सामान्य रूप से बराबर था । वे किसी के प्रति हीनता की भावना नहीं रखते हैं । परन्तु शोषण और दोहन के विरुद्ध सदैव आवाज उठाते हैं । 

उनके पश्चात् गोस्वामी जी ने उनके साफ किए मार्ग को पूर्णरूपेण ईट - पत्थरों से आवृत्त कर दिया । समता में विषमता प्रतिच्छादित हो गयी । पुनः वर्गवाद उभरक सामने आ गया , परस्पर लोग लड़ने लगे । तुलसीदास जी ने सहस्राब्दियों की जकड़न पुनः समाज पर लाद दी । जकड़ कर लोग पङ्गु हो गए । शास्त्रों के नियम उलट दिए गए । लाक्षणिक भेद छोड़ दिये गये । वेद और उपनिषदों की शिक्षा त्याग दी गयी । पुराण - स्मृतियों की बातें मनमाने ढंग से प्रचारित की गयी । कर्मणा न होकर जन्मना को आधिपत्य मिला । फलत : वर्गवाद को बढ़ने का मौका मिला परिणाम अति भयङ्कर हुआ । देश दासत्व को प्राप्त हुआं भाई - भाई में मेल नहीं , पिता - पुत्र में मेल नहीं , हिन्दू - हिन्दू में मेल नहीं । परस्पर का प्रेम दूर होता गया । विदेशियों के समक्ष गिड़गिड़ाने की आदत पड़ गयी । उन्हीं के द्वारा अपने भाइयों का ही हनन कराया गया । यह सब फल वर्गवा वादियों के कारण भुगतना पड़ा । आज जब वास्तविकता और सत्यासत्य को तौलने का मुहूर्त आया तो कबीर का पलड़ा भारी देखकर तुलसी के पूजकों ने प्रतिक्रिया 

व्यक्त करना शुरू कर दिया । कबीर और तुलसी को एक में मिलाने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया । जबकि किसी प्रकार का सम्बन्ध जुटता ही नहीं है । आज तुलसी के अनुयायी अन्त : करण में पुरानी जड़े जमाये हुए हैं । शूद्रों को किसी पद पर बैठा देखना नहीं चाहते हैं । यदि तुलसी के अनुयायी अपने घड़ियाली आँसू बहाना , वक ध्यान एवं अजगरी वृत्ति को नहीं छोड़ेंगे तो देश छिन्न - भिन्न होकर अनेक टुकड़ों में बँट जायेगा तथा जतियों के आधार पर देश का नामकरण होगा । 

समाज में इतनी घृणा अभी भी सवर्णों के अन्दर विद्यमान है कि वे पिछड़ी जाति के लोगों से स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करना पसन्द नहीं करते उनको न्यायाधीश होने नहीं देते अपना आरक्षण हजारों वर्षों से चलाते आ रहे हैं तथा दूसरे के आरक्षण पर देश की सम्पत्ति जला रहे हैं । यह घृणा - वाद तथा सामन्वाद का लक्षण है ।

 गोस्वामी तुलसीदासजी के माननेवालों को चाहिए कि प्रत्येक विद्यालयों , महाविद्यालयों , विश्वविद्यालयों एंव कार्यालयों से ब्राह्मणेतर लोगों को हटाकर केवल ब्राह्मणों को भर्ती करें । या जहाँ पर ब्राह्मणेतर शिक्षक या न्यायाधीश हो वहाँ से अपने वाद को हटाकर अलग ब्राह्मण विद्यालय एवं न्यायालय की स्थापना करें । अन्यथा उनके पुत्र - पुत्रियाँ शूद्रों की शिक्षा से दूषित हो जायेंगे तथा उन्हें न्याय भी नहीं मिलेगा । जन्मना जातिवादियों से मैं पूछना चाहता हूँ कि यदि जन्म से ही जाति है तो वे काश्मीरी मुसलमानों एवं देशके अन्य भागों में बसे शेख - सैय्यदों को ब्राह्मण क्यों नहीं मानते क्योंकि उपरोक्त लोग प्रथम ब्राह्मण थे तथा कर्मसंस्कार के आधार पर ही मुसलमान बनाए गए हैं । संस्कार के द्वारा ही ब्राह्मण या हिन्दू से मुसलमान या ईसाई बनाए गए हैं तो क्या शूद्र संस्कार के द्वारा ब्राह्मण नहीं बनाए जा सकते ?

 यदि पूर्व के ब्राह्मण लोग मुसलमान ईसाई हो गए , वे लोग आज ब्राह्मण या हिन्दू नहीं है । तो जन्मना जाति की सिद्धि नहीं होती है । यदि जन्मना जाति सिद्ध करना है तो उन्हें मुसलमान या ईसाई न कहकर ब्राह्मण ही कहना पड़ेगा । यदि ऐसा नहीं हैं तो शूद्र भी जन्मत : शूद्र नहीं है वह भी संस्कार के द्वारा ब्राह्मण हो सकता है या बनाया जा सकता है जिनका उल्लेख हिन्दू शास्त्रों में उपलब्ध है । उपरोक्त विचारानुसार जाति - पाँति पूर्णरूपेण निरर्थक है । मनुष्य की जाति मनुष्य है । उसमें योग्यता - अयोग्यता के भेद हो सकते हैं । 

इस प्रकार कबीर साहब एवं तुलसीदास जी में बहुत बड़ा अन्तर पाया जाता है । कबीर साहब ईश्वर को अजन्मा , अविनाशी एवं जन्म - मरण से परे मानते हैं । वह कभी आता जाता नहीं है , उनमें क्षरत्व - वर्धत्व नहीं हैं ऐसे वेद सम्मत विचार व्यक्त करने वाले को , गोस्वामीजी ने नीच से नीच , शंकरजी के मुख से कहलवाया है । तुलसीदास जी की दृष्टि में ऐसा व्यक्ति न साधु है , न सत्संगी , न सभ्य है , न सुजाति है , न उसको कविता का ज्ञान है । पाँवर विषयी आदि संज्ञाओं से उसे विभूषित किया है । 

तुलसीदास की बाते - 

गोस्वामी जी स्वयं वेद असम्मत बात करते है । वेद कहता है : 

सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि । नैनमूर्ध्वनतिय्थञ्च नपरिजग्रभत । वेनस्तत्पश्यन्निहितं गुहा सद्यत्रविश्व भवत्येकनीडम । तस्मिन्निद संच - विचैतिसर्व माओत : प्रोतश्यविभूः प्रजासु । प्रतद्वेचेदमृतं न विद्वानगन्धर्वो धामविभृतंगुहासत् । त्रीणि पदानि निहिता गुहास्ययस्तानिवेद स पितुः पितासत् । अनेजेदकं मनसो जवीयो नैनवेवाऽ आप्नुनन् पूर्वमर्षत् तद्वावतोऽन्यावत्येति तष्ठित्रा - स्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति । तदेजति रात्रिन्नै जाति तदूरे तद्विन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्या वाह्यतः । 

जो सबसे परे , सबसे प्रथम , जो गर्भ में नहीं आता , न मृत्यु को प्राप्त होता , जो सबसे प्रथम विराजमान था , जो नीचे ऊपर एंव मध्य में ग्रहण नहीं किया जा सकता जो समस्त दिशाओं - प्रदिशाओं को समावेष्टित कर व्याप्त है उस अजन्मा अविनाशी को तुलसीदास जी बल देकर कहते हैं : 

सोई दशरथ सुत, सोई कौशल्या के गोद । 

यदि कोई बुद्धिमान व्यक्ति इसके विरुद्ध बोलता है तो गोस्वामी जी गाली देना प्रारम्भ कर देते हैं और गालियों का रूप इतना वीभत्स होता है कि सुनने का जी नहीं चाहता । पग - पग पर गाली , शाप उनकी रसना पर दिखाई देता है । ये लक्षण निर्बलता एवं आतंक ग्रसित व्यक्ति के होते हैं । आश्चर्य होता है कि क्या गोस्वामी जी ने वेद पढ़ा था ? उनकी सारी उड़ाने स्मृति , पुराण एवं नीतिग्रन्थों तक ही सीमित है क्योंकि उनका ' मानस ' पुराण और स्मृतियों से आगे की ओर नहीं दिखाई पड़ता है । ' मानस ' का मूल आधार ‘ ब्रह्माण्डपुराण ' का उत्तरार्ध है , जिसको ' अध्यात्मरामायण ' के नाम से जाना जाता है । कुछ स्थलों को छोड़कर गोस्वामी जी ने ज्यों का त्यों ' अध्यात्मरामायण ' का अनुवाद किया है । 

जहाँ पर कबीर साहब कहते हैं : 

नारी नरक न जानिये सब सन्तन की खान । 

जामें हरिजन ऊपजै , सोई रतन की खान ।  


वहीं पर गोस्वामी जी शती स्त्रियों में भी आठ अवगुण सदा विद्यमान बतलाते है : 


नारी स्वभाव सत्य कवि कहई , अवगुण आठ सदा उर रहई । 

साहस अनृत चपलता माया , भय अविवेक अशौच अदाया । 


 इसके अतिश्रिक्त कहीं पर जड़मति , कहीं पर महाव्यभिचारणी , नरकगामिनी स्वरूपा , सदाभ्रष्टा तक कह डाला है । उपरोक्त वाक्य रामचरितमानस की चौपाइयों में विद्यमान है । रामायण के ज्ञाता प्रभुओं को ज्ञात है । यद्यपि प्रसंगवश स्त्री भोग विषयक निन्दा भरे कुछ वाक्य कबीर साहब में भी दिखाई देते हैं । परन्तु उनका अर्थ स्त्रियों को हेय दृष्टि से देखने का नहीं है । वे स्त्री - पुरुषों को विषय - वासना लेकर नरक फटकारते हैं । वे सन्तानोत्पत्ति को बरा नहीं मानते , पर उतना ही उत्पन्न करे कि जितने का पालन - पोषण कर सके । 

कबीर साहब स्त्री - पुरुष में अभेद दर्शाते हैं : 

हंस न नारी पुरुष है यह सब काल का फन्द 

अर्थात् जीवात्मा न स्त्री है न पुरुष है , इसलिए मूलतः स्त्री - पुरुष मानकर निंदा करना श्रेष्ठ नहीं है । आप विचार कीजिए दोनों में कितना अन्तर है । एक वर्गवादी , दलवादी , स्त्री - पुरुषवादी , शूद्र - ब्राह्मणवादी , सामन्तशाही एवं पूँजीवाद का समर्थक है । दूसरा सबको मिटाकर एक करनेवाला है परन्तु कबीर की महत्ता को देखकर तुलसी के पुजारी अन्यायपूर्ण वक्तव्य देकर वाग् - जाल का सहारा लेकर उनके साथ गठबन्धन कर रहे हैं । 

संत कबीर के विचार -

सद्गुरु कबीर केवल अध्यात्मवाद के ही उपदेष्टा नहीं थे , बल्कि उन्होंने भौतिक सुख - समृद्धि के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया है , उनका मार्ग सभी वर्ग के लिए समान रूप से सम्भव है । वे मुक्ति के लिए कहीं आने - जाने को विशेष महत्त्व नहीं देते । उनके लिए वन , पहाड़ , घर - द्वार समान ही है , परन्तु आस - क्तिपूर्ण गृह जीवन को भी महत्त्व देने के लिए प्रस्तुत नहीं हैं । 

कहैं कबीर जागना चाहिए , क्या गिरही वैराग्य रे । 

उनका मार्ग हद - बेहद दोनों से परे है । वे कहते है : 


हद चले सो मानव , बेहद चले सो साध 1 

हद बेहद दोऊ तजे , ताकर मता अगाध  ।।

हद छाड़ि बेहद गया , अवरण किया मिलान 1 

मध्य मार्ग में रमि रहा , पावे पद निर्वान ।।


अध्यात्म में कर्मकाण्ड एवं अतिकष्ट साध्य उपासना का कबीर साहब निषेध करते हैं । उनके पदों से स्पष्ट है : 


सहज शून्य में रमि रहे , चित्त में चिन्ता नाँहि 

जो चित्त में चिन्ता करे , सो पद पावे नाँहि ।।

एक सब्द में सब कहा , सबहिं अर्थ विचार 

भजिये निर्गुण राम को , तजिये विषय विकार ।। 


कबीर साहब सदा सहज रूप से आत्मचिन्तन की ओर संकेत करते हैं । इसी के द्वारा जन्म - मरण का अन्त मानते हैं । तीर्थ , मूर्ति की निस्सारता पर उन्होंने निषेधात्मक दृष्टि अपनायी हैं । उन्होंने एक स्थान पर तीर्थ को ' विष बेलरी ' कहा है और वह विष - बेलरी युग - युग से मनुष्यों के ऊपर छाई हुई है । जिसके कारण मनुष्यों के मूल उद्देश्य नष्ट हो गए हैं । भला ऐसी दशा में तीर्थ में जाकर कौन हलाहल पी सकता है ।  

वे कहते है : 

तीरथ भये विष बेलरी , रही युगन युगछाय 

कबीरन मूल निकंदिया , कौन हलाहल खाय 


कबीर साहब आज के साम्यवादियों एवं समाजवादियों से अत्यधिक उदार हैं । उनका कहना है कि ' सभी भूमि गोपाल की ' अर्थात् सारा भव - विभव सभी का हैं । सभी उसके अधिकारी हैं । सूर्य , चन्द्र , पृथ्वी , तेज , वायु , समुद्र , नदियाँ किसी के लिए द्वैतभाव नहीं रखते । सभी वस्तुएँ सबके उपयोग की है । धन - सम्पत्तियों का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए । बिना राष्ट्रीयकरण के समाज की विषमता दूर नहीं हो सकती है । आज के साम्यवादी एवं समाजवादी नारा तो साम्यवाद या समाजवाद का देते हैं , परन्तु उनका कार्य पूँजीवाद या सामन्तवाद का होता है । व्यक्ति का मूल्यांकन सम्पत्ति के आधार पर करते हैं । अगर सचमुच में तथाकथित समाजवादी या साम्यवादी मानव मात्र का कल्याण चाहते तो विषमता रूपी पिशाचिनी , संसार से दफना दी गयी होती । जिस देश में आज साम्यवाद है वहाँ मुनष्य को मनुष्य - पशु बनाकर रखा जाता है । न बोलने का अधिकार है , न शोषण के विरुद्ध अपने विचारों को प्रकट करने का अधिकार है । अगर कोई किसी अपरिहार्यता के लिए बोलता है , तो पुरस्कार स्वरूप बन्दूक की गोली दी जाती है । यह प्रवृत्ति सैकड़ों वर्ष पूर्व उन नरपिशाच तानाशाहों की थी जो जनता जनार्दन की कही अनसुनी कर देते थे तथा अनेक प्रकार से प्रताड़ित करके उन्हें प्राणों से वंचित कर देते थे । भला ऐसे शासन को साम्यवाद एवं समाजवाद का नाम दिया जाय यह कहाँ तक संभव है । 

कबीर का समाज - 

कबीर ऐसे समाजवाद की कल्पना करते हैं जहाँ मानव - मात्र का सम्मान हो । हर कार्यों में प्रत्येक व्यक्ति की सहमति हो । न कोई शासक न कोई शासित । सब अपने विवेक से कार्य करे । सबकी दुर्भावनाएँ विनष्ट कर दी जाय । वर्तमान जनतन्त्र किसी काम का नहीं है । रात - दिन उद्यम मची हुई है । गरीब सताये जा रहे हैं एवं अमीर बढ़ाये जा रहे हैं । इनकी अजगरी मनोवृत्ति देश के सिंहासन पर लगी हुई । वर्तमान समय में देश में गरीबों के हिमायती कहे जानेवाले समम्यवादी ऐसे हैं जो सामन्तों से भी बढ़े - चढ़े हुए है । इसलिए वर्तमान साम्यवादी न तो देश की गरीबी को दूर कर सकते हैं न गरीबों का संरक्षण कर सकते हैं । इसके लिए सद्गुरु कबीर का विचार उपयोगी होता है । 

जब तक वर्गवाद बना रहेगा तब तक शांति व्यवस्था असम्भव है । इसीलिए सद्गुरु कबीर कहते है : 


एक बून्द से सृष्टि रची है , को ब्राह्मण को सूद्र । 

हमहूँ राम का तुमहूँ राम का , रामहि का सब संसारा ।। 

कहैं कबीर सुनो ही सन्तो , कौन राम से निन्यारा । 

हमहूँ चाम का तुमहूँ चाम का , कौन चाम से निन्यारा ।। 

कहैं कबीर सुनो ही सन्तो , चामहि का सब संसार । 


मनुष्यों में अभेदत्व प्रदान करते हैं । साथ ही कबीर साहब पुरुषार्थ के सामने भाग्यवाद को महत्व नहीं देते हैं । यद्यपि कुछ यथार्थता को अंगीकृत करते हैं । यथा पुनर्जन्म , कर्मफल आदि । परन्तु अंधविश्वास का जहाँ तक प्रश्न है उससे हटकर उपरोक्त तथ्यों पर विचार करते हैं । उनका उपदेश सार्वभौम , सार्वजनीन , मानवतावादी , विश्व कल्याणकारी है । एक स्थान पर सभी को एकत्रित करने का आह्वान करते हैं । उनका उपदेश सार्वभौम , सार्वजनीन , मानवतावादी , विश्व कल्याणकारी है । एक स्थान पर सभी को एकत्रित करने का आह्वान करते हैं । 

तुलसीदास का समाज -

दूसरी तरफ गोस्वामी जी ने समाज के मूलस्तम्भ को निम्न समझ कर उनकी अवहेलना की है । तुलसी की दृष्टि में कबीर के प्रत्येक विचार अमान्य प्रतीत होते हैं । तुलसी ने साग सब्जी उगाने वाले , गाय , भैस , दूहने वाले , तेल चुवाने वाले , पानी पीने का घट निर्माण करने वाले , व्यापार के द्वारा देश को समृद्धि करनेवाले अर्थात् नाऊ , धोबी , अहीर , गड़ेरी , कोइरी , कुर्मी , तेली , कुम्हार , तेली , कुम्हार , बनिया , कलवार , भंगी , हलखोर , चमार , दुसाध , पासी , पनेरी , माली , नोनिया , मल्लाह , कोल्ह , किरात लोहार , बढ़ई , स्वपच आदि जो समाज के हाथ - पैर हैं इन सब जातियों को शूद्र - महाशूद्र , अपावन , अन्त्यज कहकर सारे अधिकारों से वंचित कर दिया है । यदि इन जातियों में भगवान भी अवतरित होते हैं , तो जातियाँ सम्मान एवं पूजा के योग्य नहीं हैं । 

इनके लिए मन्दिर में जाना , वेद पढ़ना , ब्राह्मणों के रसोई में भोजन बनाना महापाप है । उपर्युक्त जातियाँ केवल सेवा के लिए सामन्तों की लादी ढोने के लिए तुलसीदास जी की दृष्टि में निर्मित हुई हैं । गोस्वामी जी कट्टर जातिवादी थे । उन्होंने विरोधाभास पर जरा भी विचार नहीं किया । तुलसीदास जी ने देवलोक की वन्दना करने के बाद सर्वप्रथम पृथ्वी पर अपने जाति - बिरादरी की वन्दना करता है । यदि मर्यादा के ख्याल से सर्वप्रथम माता - पिता की वन्दना की गयी होती , तो युक्तियुक्त था , क्योंकि शास्त्रानुसार सर्वप्रथम माता - पिता ही पूज्य हैं । परन्तु वैसा न करके अपनी जाति की बन्दना करके कबीर के प्रतिकूल विचारों की पुष्टि की गयी है , तुलसी ने भगवान राम को जंगलों में घुमाते हुए तपः ऋषियों से भी प्रणाम एवं चरणस्पर्श कराया है , यह प्रक्रिया सामन्तवाद का द्योतक है । दूसरी बात वयोवृद्ध महर्षि परशुराम का लक्ष्मण के द्वारा मजाक उड़ाया गया है । इसी प्रकार रावण की सभा में राजदूत अंगद से भी रावण को अपमानित कराया गया है। स्थान - स्थान पर ऐसे बहुत से कथानक ' रामचरितमानस ' में विद्यमान हैं जिन पर विचार किया जाय तो वे मर्यादा से कोई  सम्बंध नहीं रखते । 


तीसरी बात , तुलसीदास ने वन्दना के दौरान ' सियाराम मय सब जग जानी करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी ' लिखा है । आगे चलकर सियाराम को अनेक वर्गों में विभक्तकर छिन्न - भिन्न कर दिया गया है । गोस्वामी जी के दृष्टान्त अनूठ है । , कहीं कहीं वे रासभी और गाय का दृष्टान्त देकर शूद्र तथा ब्राह्मण का विलगाव करते हैं । 

दुष्टौ घेनु दुहि सुनु भाई , साधु रासभी दुही न जाई । 

अर्थात् दुष्ट ब्राह्मण की पूजा करना अच्छा है । साधु - सज्जन सर्वगुण सम्पन्न शूद्र कभी पूज्य नहीं हो सकता । विचारणीय विषय यह है कि गाय और गदही दो जातियाँ हैं , इनका विभाजन प्राकृतिक है । दोनों में किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं हो सकता । पर प्रकृति की तरफ से शूद्र और ब्राह्मण में कोई भेद नहीं है । दृष्टान्त सजातीय होना चाहिए । विजातीय दृष्टान्त देकर पराशरी का अनुकरण किया गया है जो मानव मात्र के लिए हानिकर है । आश्चर्य तो यह होता है कि तुलसीदास जी को लोग हिन्दू एवं ब्राह्मण कहते हैं । पर तुलसीदास ने ब्राह्मण - अब्राह्मण की खूब पिसाई - कुटाई की है । कहीं पर ब्राह्मण के पैर पर क्षत्रियों को गिराया है , कहीं क्षत्रियों को अन्त्यजों का जूठा खिलाया है । कहीं क्षत्रियों का जूठा ब्राह्मणों को खिलाया हैं । तुलसीदास ने हिन्दू समाज को पथभ्रष्ट करने का तरीका अपनाया है । इससे अनुमान होता है कि तुलसीदास जी न ब्राह्मण थे न हिन्दू ।  

तुलसीदास का जन्म और जाती - 

तुलसीदास जी का एक पद है , जिससे उनकी जाति के बारे में कुछ निर्णय किया जा सकता है : 


घूत कही , अवधूत कही , रजपूत कही , जोलहा कहौ कोऊ । 

काहू की बेटी सो बेटा न ब्याहब , काहूं की जाति बिगारन सोऊ । 

माँगि कै खैबो , मसीत को सोइबो , लैबो को एकु न दैबे को दोऊ । 


इस पद पर ध्यान से विचार करना चाहिए । गोस्वामी तुलसीदास के जीवन - काल में ही उक्त पद के अनुसार उनके बारे में संदेह उत्पन्न हो गया जान पड़ता है । पहले तो यह सुना जाता है कि लड़का फेका हुआ पाया गया था जिस के एक कहारिन ( चुनियाँ ) ने पाला था । साढ़े पाँच वर्ष व्यतीत होने पर कहारिन भी मर गयीं । उसके बाद किसी ब्राह्मण साधु ने पढ़ाया - लिखाया एवं साधु संस्कार दिया । लेकिन बाद में पोल खुलने पर कि यह ब्राह्मणेतर है लोग धूर्त , अवधूत , भी कहने लगे , कोई राजपूत भी कहता था । 

गोस्वामी जी इन सब बातों को लेकर क्षुब्ध हो गए । अन्त में उन्होंने कहा कि जोलाहा कहे मुझे इसकी चिन्ता नहीं है । मैं माँग कर खाऊँगा , मस्जिद में शयन करूंगा । ध्यान देने की बात है कि उन्होंने मन्दिर का नाम नहीं लिया । इसके विपरीत मस्जिद का नाम लिया तथा अन्त में जोलाहा भी कहा । इसलिए हिन्दू होने में सन्देह बना रहता है ।

कबीर और तुलसी का मेल - 

 कबीर साहब और गोस्वामी तुलसीदास जी इसी एक अंश में मेल रखते हैं , क्योंकि दोनों के जन्म की कथा एक ही जैसी मिलती है । सम्भव है कि दोनों जोलाहे हों या दोनो विधवा ब्राह्मणी के पुत्र हों । कुछ कहा नहीं जा सकता , साम्प्रदायकि मान्यताएँ आकाश छू रही हैं । इस बात को परमेश्वर तथा इन दोनों को जन्म देनेवाले माता - पिता ही जान सकते हैं । अन्यथा कुछ कहना असम्भव है । 

तुलसीदास की बाते - 

एक बात पर और आश्चर्य होता है कि गोस्वामीजी एक महान वैष्णव के शिष्य थे , परन्तु उन्होंने वैष्णवों के ऊपर स्मार्तों का धर्म लाद दिया है । हमारे वैष्णव बन्धु इस बात को समझते होंगे कि जहाँ वे एकेश्वरवादी थे वहीं पर बहुदेववाद उनके ऊपर लादा गया है । यदि नहीं समझ पा रहे हैं तो तुलसीकृत रामायण को खूब ध्यान से पढ़ें और उसके अर्थ का पुनरावलोकन करें । 

वैष्णव धर्म को समझने के लिए ' कबीर - बीजक , ' कबीर ग्रन्थावली , ' ' कबीर साखी , ' ' विष्णुपुराण , ' ' नारदीय सूत्र , ' पञ्चरात्र , ' रामतापनीयोपनिषद् , ' ' वैष्णवमताब्ज भास्कर ' आदि पर्याप्त हैं । 

जिस भ्रमजाल को सद्गुरु रामानन्दाचार्य एवं उनके द्वादश प्रधान शिष्यगण एवं प्रशिष्यगण ने छिन्न भिन्न कर दिया था , तुलसीदासजी ने उसी भ्रमजाल को सद्गुरुओं की सन्तानों पर लाकर थोप दिया । ऐसी दशा में कबीर और तुलसी का आन्तरिक साम्य दिखानेवाले को प्रत्येक पहलू पर दोनों का विचार करना चाहिए कि कहाँ कमी है , किसमें कहाँ पूर्णता है । तुलसीदास ने श्रीरामानन्द एवं कबीर से रुष्ट होकर उभय के विपरीत विचार व्यक्त किया है । हो भी  सकता है कि तुलसीदासजी प्रथम स्मार्त रहे हों ? 

स्मार्तो के खेमे में से वैष्णवों के खेमे में घुसकर उसने उनकी सारी मान्यताओं को छिन्न भिन्न कर दिया । उसकी आड़ में स्मार्तो ने वैष्णव धर्म में घुसकर अपना आधिपत्य जमा लिया और विषमता का अखाड़ा बना दिया । आज वैष्णव धर्म परिहास का विषय बना हुआ है । वैष्णव धर्म में जाति - पाँति छुआ - छूत , वर्णाश्रम का नाम नहीं था । सनकादिक से लेकर महर्षि नारद , परमगुरु शठकोपाचार्य , आचार्य प्रवर रामानन्द और उनके परमशिष्य सद्गुरु कबीर ने वैष्णव धर्म को उजागर किया था । उसी परम वैष्णव धर्म को तुलसी ने उनकी सन्तानों से दूर कर दिया । यों कहिये तुलसी प्रच्छन स्मार्त थे क्योंकि प्रारम्भ में ही पञ्च देवों की वन्दना कर अपने स्मार्त धर्म का परिचय दिया है । वैष्णव धर्म में एकेश्वरवाद के अतिरिक्त किसी देवी - देवता की उपासना नहीं है।  तुलसी बहुत कुशल कवि थे , कहीं - कहीं वैष्णवों को खश करने के लिए वैष्णवाद का भी उल्लेख किया है । 


यथाः जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे , विधि हरि संभु नचावनिहारे । 


दूसरी ओर अपने स्मार्त धर्म का प्रतिपादन करते दिखाई देते हैं । श्री भगवान राम के मुख से कहलवाया है जो शिव की भक्ति नहीं करेगा , वह मुझे प्रिय नहीं होगा । इसी प्रकार से स्थान - स्थान पर अपने स्मार्त धर्म का प्रतिपादन किया है । 

गोस्वामी जी का सारा प्रयत्न वैष्णव धर्म को स्मार्त धर्म में लाने का रहा है । तुलसीदास जी स्वयं अपनी बात पर विश्वास नहीं करते , क्योंकि बात - बात पर , पग - पग पर अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वेदों की दुहाई देते हैं । तुलसीदास जो कुछ कहते हैं वह सब उनकी समझ में वेद सम्मत है । 

तुलसी के पुजारियों में कबीर वैष्णव धर्म का भय समा गया है । वे कबीर वैष्णव धर्म का प्रचार - प्रसार देखकर आंतकित हो गए हैं । इसीलिए आज वे कबीर से तुलसी का मेल - मिलाप करने की चेष्टा में लगे हुए हैं । अर्थात् कबीरपंथ पर भी स्मार्त धर्म लादने का जी - तोड़ प्रयास कर रहे हैं । उन्हें चाहिए कि रामानन्द , कबीर साहब एवं सद्गुरु शठकोपाचार्य के विचारों को समझें । समाज को उक्त गुरुओं के विचारों से अवगत करावें । वैष्णव धर्म राग - द्वेष , मानापमान , ऊँच - नीच एवं संसार की प्रत्येक विषमताओं का अखाड़ा बन गया । स्मार्त लोग पहले वैष्णवों से बड़ी लड़ाई लड़ा करते थे , जिसमें मारकाट भी शामिल था । परन्तु वैष्णवों के समक्ष उसकी एक भी नहीं चली तत्पश्चात् स्मार्त  , वैष्णव - धर्म को बिगाड़ने के लिए मेल मिलाप की बात करने लगे । परन्तु आज वैष्णव की मूलधारा जो कबीरपंथ के नाम से जानी जाती है वह अभी तक स्मार्तों के जाल में नहीं फँस सकी है । इसकी दूसरी धारा जो अनन्तानन्द की परम्परा से चली है , उसमें स्मार्तों का समावेश उसको तीसरी पीढ़ी से शुरू हो गया । इसलिए आज पूर्ण वैष्णव के रूप में कबीरपंथ ही विद्यमान है । इसके द्वारा मनुष्यरूपी भगवान की सेवा की जा सकती है जो सभी का शुभचिन्तक है । 

कबीर और वैष्णव धर्म - 

कबीर - वैष्णव धर्म मानव मात्र का सम्मान करता है । वहीं पर गोस्वामी तुलसीदास ने दक्षिणी भाइयों को , बानर , भालू , पशु की संज्ञा दी है और द्रविड़ आर्यों को राक्षस भी कहा है । जिसके कारण आज दक्षिण और उत्तर के भाइयों में एकता नहीं हो रही है । दक्षिण के भाई तुलसीकृत रामायण का नाम भी नहीं सुनना चाहते । भाई से भाई को लड़ाने का उपक्रम स्मार्तों के द्वारा बहुत दिनों से चलाया जा रहा है । 

यहाँ तक कि अपने पिछड़े भाइयों को मंदिर में नहीं जाने देते । पता नहीं स्मार्तों की बाल - लीला कबतक चलेगी आज कबीर साहब की कृपा है कि सिर्फ भारत के भाई ही नहीं , अपितु सम्पूर्ण संसार के मनुष्य एक स्थान पर बैठकर सोचने - समझने के लिए बाध्य हो रहे हैं । ज्ञातव्य है कि मैं इन्हें वैष्णव नहीं मानता जो जाति - पाँति , छुआ - छूत , ऊँच - नीच का भेद मानते हैं । मन्दिर एवं भोजनालय में केवल ब्राह्मणों को ही रखते हैं । ऐसे लोग स्मार्त धर्म से प्रभावित है । 

वानर और वानर जाती - 

परम सन्त श्री हनुमानजी बानर जाति के क्षत्रिय थे । हनुमानजी की माता अंजना गौतम गोत्र की थी । इसी प्रकार बालि , सुग्रीव तथा उनकी विशाल वाहिनी सेना बानर क्षत्रियों से सुसज्जित थीं । सब बड़े शूरवीर , लड़ाकू थे । ' वाल्मीकि रामायण के अनुसार यदि लंका की उस लड़ाई में हनुमानजी नहीं होते तो जामवन्त के कथनानुसार भगवान श्री रामचन्द्र का जीतना ही नहीं लौटना कठिन था । वनार्य क्षत्रियों में लड़ाई की ही कुशलता नहीं थी बल्कि उनमें बड़े - बड़े इंजीनियर , आयुर्वेदज्ञ एवं वैज्ञानिक थे । नल - नील जैसे इंजीनियरों की कमी नहीं थी जिनके बिना समुद्र पर पुल बाँधना सम्भव नहीं था । उस समय के प्रसिद्ध वैद्य सुखेन जी बानर जाति के ही क्षत्रिय थे । इसी प्रकार सहस्रों गणमान्य साईन्स मौजूद थे जिनका श्रेय लंका की विजय में है । भला ऐसे शूर - वीरों को राग - द्वेष के कारण गोस्वामी तुलसीदास ने असभ्य , अकुशल , बानर , भालू की संज्ञा दे दी है । 

बानर क्षत्रियों का राज्य बहुत विशाल था । आज के मलाया , हिन्देशिया , जावा , सुमात्रा , बालिद्वीपसमूह , श्याम - कम्बोडिया , हिन्द चीन एंव दक्षिण पूर्व एशिया के पूरे देश पर वे शासन करते थे । इसी प्रकार मतिमान श्रीमान् जामवन्तजी सम्भवतः ब्राह्मण जाति के परम विद्वान् योद्धा थे जिनकी लड़की जामवन्ती का विवाह भगवान श्री कृष्णचन्द्र से हुआ था । ये बातें पुराकथा के पृष्ठों पर अंकित है । मानसकार ने इन्हें भालू कहकर घोर अपमान किया है । जिन लोगों ने श्री रामचन्द्र को लंका में विजय दिलवायी थी उन्हीं लोगों को मानसकार ने नर - पशु की संज्ञा दी है । इसे कृतघ्नता कहेंगे कि कृतज्ञता ? 

यदि बालि , सुग्रीव एवं जामवन्तजी बानर - भालू होते तो उनके लड़के लड़कियों की शादी मनुष्यों के साथ कैसे हुई होती ? परन्तु सारी बातों को जानते हुए भी दक्षिणी आर्यों का घोर अपमान किया गया है । इसके चलते आज विद्वेष बढ़ता जा रहा है । वेद सभी को आर्य बनाने पर बल देता है । वहीं गोस्वामी तुलसीदास वेद की दुहाई देने वाले भाई - भाई में लड़ाई कराने के लिए तुले दिखाई देते हैं । 

आज उनके पुजारी उनकी जन्मशती मानते नहीं अघाते और कबीर साहब का नाम लेने में नाक - भौं सिकोड़ते हैं । भला उनसे मेल - मिलाप कैसे हो सकता है कबीर साहब का अपना अलग अस्तित्त्व है वही मानव की समस्त समस्याओं का निवारण करने में समर्थ हैं । इसलिए भारत के हितैषियों को चाहिए कि सद्गुरु कबीर के विचारों को संसार में बिखेर दें । विश्व की सारी जनता को कबीर के खेमे में लाने का प्रयत्न करें अन्यथा ईसाई , मुसलमान , स्मति आदि धर्मों में जाने पर अनेकत्व समाप्त होनेवाला नहीं है । यदि आप ईसाई हो जाते हैं तो काले - गोरे का भेद बनारहेगा । 

यदि इस्लाम हो जाते हैं तो शेख - सैय्यद जुलाहे का भेद बना रहेगा यदि आप बौध्द , जैन में जाते हैं तो ईश्वर और आत्मा से हाथ धो बैठेंगे । इसी प्रकार यदि शौव शाक्त स्मार्त में जाते हैं तो शूद्र - ब्राह्मण का भेद प्रगाढ़ हो जायगा और तुम अपने सारे अधिकारों से ही नहीं , अपितु मनुष्यता से भी वंचित हो जाओगे । इसलिए कबीरपंथ को अपनाकर समस्त सुख के भागी बने तथा अधिकारों की रक्षा करें , जिससे मानव जन्म लेना सार्थक हो । 

कबीर के विचार आर्थिक स्थिति पर -

कतिपय लोग कहते हैं कि कबीर साहब ने आर्थिक विषमता के विषय में कुछ नहीं कहा । ऐसे लोग कबीर साहब की वाणियों से पूर्णरूपेण अपरिचित होने के काराण इस प्रकार की बातें कहते हैं । कबीर साहब जैसे महान अपरिग्रहवादी एवं समाजवादी न कोई हुआ है , न है । जब कबीर साहब कहते हैं : 


साई इतना दीजिए , जामें में कुटुम्ब समाय। 

मैं भी भूखा ना रहूं , साधु न भूखा जाय ।। 

पानी बाढे नाव में, घर बाढ़ै दाम। 

दोनों हाथ उलीचिये , यही सयानो काम ।। 


जो व्यक्ति कहता है कि धन का उतना ही संग्रह करो जिससे तुम्हारा एवं तुम्हारे परिवार का निर्वाह हो जाय । तुम्हारे यहाँ आये अतिथियों का भरण हो जाय । उससे अधिक संग्रह न करो । यदि धन बढ़ता है तो उसको दोनों हाथो से अभावग्रस्त लोगों को लुटाओ अर्थात् सत्कार्य में लगाते जाओ । एक स्थान पर केन्द्रित न होने दो नहीं तो इसका बहुत बड़ा दुष्परिणाम होगा । कबीर साहब कहते हैं कि यदि एक स्थान पर धन को केन्द्रित करोगे तो जैसे नाव में पानी भर जाने पर नाव डूब जाती है उसी प्रकार तुम भी धन के द्वारा अनाचार करोगे तथा अन्त तुम्हारा सर्वनाश हो जयेगा । वे यहाँ तक कहते हैं ' ज्यों आवें त्यों फेरि हो ' जैसे ही तुम्हारे पास धन इकट्ठा हो वैसे ही सत्कार्य में धन का व्यय करों अन्यथा तुम्हारा खानदान व समाज डूब जायेगा । 

ऐसी आर्थिक विषमता मिटानेवाले समतावादी कबीर को उनकी वाणियों से अपरिचितों ने क्या - क्या नहीं कह डाला । किसी ने भक्त तक सीमित रखा । किसी ने अद्वैतवाद तक सीमित रखा , किसी ने सुधारक तक सीमित रखा , जबकि कबीर की सीमा देशकाल से परे है । उनका विचार सार्वभौम , सर्वजनीन , ' सर्वजन हिताय - सर्वजन सुखाय ' है । लेखक उनकी वाणी का गहन अध्ययन न कर सीमाओं का आरोपण करते रहते है । 

आज का बुद्धिजीवी कबीरवाणी के द्वारा अपने - अपने देश की समस्याओं का समाधान करने के लिए प्रयत्नशील है । यह सच और सही भी है कि कबीर वाणी की उपादेयता आज के संदर्भ में उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार भूखे को अन्न की आवश्यकता यावत जीवन बनी रहती है । कबीरवाणी के द्वारा समस्त मनुष्यों में नवजीवन का संचार होना अवश्यम्भावी है । जहाँ पुरोहितवाद , पूँजीवाद समाज का शोषण कर रहा है , जनतन्त्र के नाम पर सामन्त का व्यवहार हो रहा है , जाति - पाँति तोड़ने के नाम पर जाति - पाँति का सम्बन्ध जोड़ा जा रहा है , धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म की सापेक्षा बरती जा रही है , जहाँ पर पण्डा - पुजारियों , तीर्थाभिमानियों से लोग घबड़ा चुके हैं , वहीं पर सद्गुरु की वाणियाँ बिलकुल उनके विपरीत आवाज बुलन्द कर रही हैं । इसलिए आज के समाज को कबीर साहब की वाणियों को मनोयोगपूर्वक अध्ययन - अध्यापन कर - कराके प्रत्येक समाज के लोगों को उससे लाभ उठाना चाहिए । 

कबीर साहब की वाणियाँ सभी क्रान्ति की जननी कही जा सकती हैं । मन्त्रवत ग्रहण कर क्रान्ति के लिए समाज को शीघ्रातिशीघ्र उभाड़ना चाहिए । जिस प्रकार कबीर साहब ने जेहाद ( धर्मयुद्ध ) छेड़ा था एवं सामन्ती ब्राह्मणों की नगरी में रहकर सत्य के लिए संघर्ष व बगावत की थी तथा ब्राह्मण - सामन्तों के ऊपर वाणीरूपी गोली से गोलाबारी की थी , वहीं समाज में ब्राह्मणों द्वारा फैलायी गयी बुराइयों के गढ़ को अपने तीखे स्वरूपी बाण से ध्वस्त कर दिया था । आज के समाज के प्रत्येक शरण चाहने वाले , अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले संसार में शांतिपूर्वक जीवन यापन करने वाले एवं आगे बढ़ने वालों को कबीरवाणी रूपी अस्त्र लेकर बुराइयों का शिर काटना चाहिए । सामन्तवाद के पोषकों को समापन करना चाहिए । यदि आज का मानव कबीर से दूर हटता है तो वह अपने हित एवं अपनी आत्मा से भी दूर हट जायेगा , क्योंकि कबीर साहब जैसा महामानव कारुणिक व्यक्ति सही मार्ग निर्देशक कोई दिखाई नहीं दे रहा है । 

आज देश का भविष्य तमागार में आमूल धंसता जा रहा है । किसी नेता या किसी धर्मगुरु के मान का नहीं रह गया है । गली - गली में , गाँव - गाँव में , नगर - नगर में , प्रान्त - प्रान्त में , देश - देश में मार - काट , विषमता के कारण है । निवारणार्थ बड़े - बड़े शस्त्रास्त्र बनाए जा रहे हैं । किन्तु वह विषमता मिटाने के बजाय विषमतारूपी जहर संसार में और छिड़क रहे हैं । सारा मानव मस्तिष्क विकृत हो गया है । चतुर्दिक अशांति की लहर चक्रवात के साथ उमड़ती दिखाई दे रही है । शांति नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है । काले - गोरे का झगड़ा , शेख - सैय्यद - जोलाहे का झगड़ा , चारों तरफ झगड़ा ही झगड़ा दिखाई पड़ रहा है । ऐसी दशा में सद्गुरु कबीर की वाणियाँ राजनेता एवं धर्मगुरु का कार्य करने में पूर्णरूपेण सक्षम हैं । केवल उनको हस्तगत कर कण्ठगत कर लेने की आवश्यकता है । कबीरवाणी रूपी सूर्य अज्ञानरूपी तम को छिन्न - भिन्न कर देश को बचा सकता है और सभी को सही दिशा दे सकता है । सभी अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच सकते हैं । 

कबीरवाणी स्वानुभूतिपरक है , स्वसंवेद्य है । वह व्यक्तिवाद का पोषक नहीं है , न किसी अवतार की महिमा गानेवाली है । न किसी जाति के लिए है । वह मनुष्य के प्रत्येक रोग की महौषधि है । अंधों की आँख है , पंगुओं का पैर , बधिरों का कान , मूकों की जिह्वा , भूखों का भोजन , नंगों की चीर एवं निर्बलों का बल है । उसी के द्वारा सामन्तशाही एवं धर्मगुरु शाही का अन्त किया जा सकता है ।


 कबीर और तुलसी  / kabir or tulsi 

कबीर और तुलसी की वास्तविकताएं -

संत कबीर के विचार -

संत विचारदास 

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