कोई सतगुरु सन्त कहावे
साखी
1- सतगुरू सम कोई नहीं , सात द्वीप नौ खण्ड
तीन लोक ना पाईयो और इक्कीस ब्रह्माण्ड ।।
2- सतगुरू की महिमा अनंत है , अनंत किया उपकार ।
अनंत लोचन उघाड़िया , अनंत दिखावन हार।।
भजन
टेक- कोई सतगुरू सन्त कहावे , जो नैनन अलख लखावे ।।
1- डौलत डिगे न बोलत बिसरे , अस उपदेश दृढ़ावे
प्राण पुज्य क्रीया से न्यारा , सहज समाधि लगावे ॥
कोई सतगुरू सन्त कहावे , जो नैनन अलख लखावे ।।
2- द्वार न रौंधे पवन नहीं रोके , नहीं अनहद उरझावे
यह मन जाई जहाँ लग जबहि , परमातम दरसावे ॥
कोई सतगुरू सन्त कहावे , जो नैनन अलख लखावे ।।
3 .करम करे निहः करम रहे जो , ऐसी युक्ति लखावे
सदा आस विलास नहीं तन में , भोग में जोग कमावे ।।
कोई सतगुरू सन्त कहावे , जो नैनन अलख लखावे ।।
4 . धरती त्यागे आकाश को त्यागे , अधर मडैया छावे ,
सुन्न शिखर के सार शिलापर , आसन अचल जमावे ॥
कोई सतगुरू सन्त कहावे , जो नैनन अलख लखावे ।।
5 . भीतर है सौ बाहर देखे , दूजा दृष्टि न आवे
कहत कबीर हंस गति न्यारी , आवागमन मिटावे ।।
कोई सतगुरू सन्त कहावे , जो नैनन अलख लखावे ।।
संक्षिप्त भावार्थ - इस पद में साहब कबीर ने हंस गति , जिसके लिये हंस सहज रूप से अपने सुआहार को चुनकर बाकी वस्तु को वैसी ही छोड़ देता है । इसी प्रकार से अलख जो लखने में नहीं आता उसके लिये इस भौतिक संसार में रहकर बाहरी पट योग क्रिया के ऊपर उठकर कर्म करते हुए निः कर्मी रहे ताकि उसे सभी ओर एक ही नूर का दीदार हो । दूजा दृष्टि में नहीं आवे । यही सहज रूप से मन की अचल स्थिति को लाने का प्रयास करें जो सहज समाधि है ।
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